माओवादियों के नर्क में उत्सव मनाने वाले
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आलोक तोमर
स्वामी अग्निवेश पिटे हुए या बीते हुए फिल्मी सितारों की तरह हैं जिन्हें रिटायरमेंट की सोचते सोचते अचानक एक हिट फिल्म नसीब हो जाती है या जैसे अमिताभ बच्चन के साथ हुआ था। एक कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति उनका भाग्योदय कर देता है, किस्मत और नियति की दिशा बदल देता है।

यही अग्निवेश के साथ हुआ। अपने सामाजिक सरोकार यानी बंधक बच्चों को छुड़ाने के अभियान में उनका आंदोलन नुक्कड़ सभा में बदलता जा रहा था और अग्निवेश अपने आर्य समाज के अतीत को वर्तमान बना कर उसी में भविष्य तलाश रहे थे। अचानक उनकी जिंदगी में माओवाद का मंत्र आया और वह भी इसलिए कि जन्म से स्वामी जी तेलगु और उस पर भी राव हैं और माओवादी आंदोलन पर राव जाति की खूब चलती है।

इस बात को तो भुला ही दीजिए कि माओवाद धर्म, जाति और कर्म कांड से परे है। सबसे मशहूर माओवादी कमांडरों में से एक किशन जी का नाम भी कोटेश्वर राव है। अग्निवेश के संपर्क कुछ माओवादिओं से हुए और वे खुद मंजूर करते हैं कि इन संबंधाें को पनपाने में उन्होंने हेमचंद्र पांडे नाम के पत्रकार का इस्तेमाल किया। यही पत्रकार आजाद नाम के ताकतवर माओवादी कमांडर के साथ फर्जी या असली आप चाहे जो कहे, मुठभेड़ में मारा गया। अग्निवेश ने फौरन श्रेय बटोरने का अभियान शुरू किया और कहा कि माओवादी बातचीत शुरू करना चाहते थे और इसीलिए आजाद उनका संदेश ले कर आंध्र प्रदेश से छत्तीसगढ़ जा रहा था और रास्ते में नागपुर से उठा कर उसका और हेमंचद्र पांडे का एनकाउंटर कर दिया गया।

इस दावे ने अग्निवेश को इतनी प्रासंगिकता तो दी कि जो चिदंबरम उन्हें महीनों में मिलने का समय देते थे, वे फोन पर आने लगे और पत्रों का जवाब देने लगे। अग्निवेश को ममता बनर्जी ने भी लालगढ़ की अपनी तूफानी रैली में क्रांतिकारी बता कर पेश किया और अग्निवेश ने भी कहा कि आजाद की फर्जी मुठभेड़ की जांच होनी चाहिए और वे आजाद को श्रंध्दाजलि देते हैं। आज भी अग्निवेश की राय में आजाद देशभक्ति का एक बड़ा प्रतीक था। वे भारत सरकार के वार्ताकार और माओवाद के मामले में प्रवक्ता बनना चाहते हैं और इसीलिए बयानबाजियां और इंटरनेट पर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।

भारत मे माओवादियों के मुद्दे और पूरे माओवाद को ही ले कर बहस भटक गई है। एक तरफ हवाई जहाजों में घूम कर एयरकंडीशंड सेमिनारों में प्रवचन करने वाले अरुंधती राय जैसे महान बुध्दिजीवी है जो तीन दिन माओवादी हत्यारों के संरक्षण में उनके आखेट स्थल का दौरा कर के आई और जब से लौटी है, तब से उसे भुना रही है। छत्तीसगढ़ और बिहार में हाल ही में जिन निर्दोष आम लोगों की हत्या माओवादी कातिलों ने की है उनके लिए अरुंधती और अग्निवेश के पास करुणा और सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं है। महाश्वेता देवी दुनिया को बदलने के लिए लिखती रही है और माओवादियाें के तरीकों से नहीं तो सरोकारों से जरूर उनका गहरा वास्ता है मगर जब माओवादी बस उड़ाते हैं या सुरक्षा बलों के जवानों को मारते हैं या पुलिस वालों का अपहरण कर के और कत्ल कर के लाश फेक देते हैं तो महाश्वेता देवी का दिल दुखता है। साहित्य और समाज में महाश्वेता देवी की जो हैसियत हैं उसको इस जन्म में अरुंधती राय कभी नहीं पा सकती और स्वामी अग्निवेश तो खैर इतने घाटों का पानी इतने बर्तनों में पी चुके हैं कि उन पर उनके साथी भी कोई खास भरोसा नहीं करते।

दिक्कत भारत सरकार की भी कम नहीं है। चिदंबरम कहते हैं कि माओवादियों से तब तक कोई बात नहीं हो सकती जब तक कि वे हथियार डाल कर आत्मसमर्पण नहीं कर दे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि माओवादी हमारे भाई हैं और हम उनसे बातचीत करने के लिए तैयार है। यह सही है कि अगर विकास हुआ होता और आदिवासी अंचलाें में और जंगलों में लोग, खास तौर पर आदिवासी सुख से सुरक्षित रह रहे होते तो माओवादियों को पांव टिकाने की जमीन भी नहीं मिलती। मगर इसका अर्थ यह भी कतई नहीं हैं कि हमें माओवादी बताएंगे कि देश के विकास का मॉडल कैसा होना चाहिए और अधिकारी अपनी सरकारों की बजाय दलम की पंचायत में दिया गया हुक्म मानेंगे।

विकास की गति बहुत धीमी है इसके लिए हमारी निर्वाचित सरकारे अपराधी है लेकिन उन्हें हमने चुना है। रमन सिंह और शिवराज सिंह से अगर कोई जवाब मांगना होगा तो हम और आप मांगेगे। जवाब उन्हें देना पड़ेगा मगर माओवादी अगर अपने आपको न्यायमूर्ति और भारत के लोकतंत्र को अपराधी और हवालाती साबित करने की कोशिश करेंगे तो जाहिर है कि उनका एक ही इलाज है और वह है गोली। जब गोलियां बरसेंगी तो अरुंधती इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में और अग्निवेश जंतर मंतर पर बंधुआ मुक्ति मोर्चा के उजड़े हुए दफ्तर में बैठे नजर आएंगे। फायरिंग में माओवादी मारे जाएंगे, सुरक्षा बल तबाह होंगे और आम आदमी उजड़ जाएगा। जिन लोगों को माओवाद में दुनिया के परिवर्तन की दिशा नजर आती हो वे जरा चीन की ओर नजर घुमा कर देख ले। चीन में माओवाद कब का गायब हो चुका है और थ्यानमान चौराहे पर माओ की एक प्रतिमा है मगर यह चौराहा यहां हुए उस नरसंहार की वजह से ज्यादा याद किया जाता है जिसमें हजाराें लोग मारे गए थे।

भारत में माओवाद से निस्तार पाना तत्काल और आपात हिसाब से जरूरी है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है कि देश के लगभग आधे सुरक्षा बल कुछ हजार माओवादियों और उनके कुछ लाख बंधक चेलों से निपटने में लगे हैं। सरकार के लिए तो फिर भी कानून है मगर माओवादियों का कानून और संविधान तो सिर्फ बंदूक है जिससे वे विकास की भाषा नहीं लिख रहे, विनाश का भविष्य लिख रहे है। विनाश तो माओवादियों का भी होगा मगर देश के इतिहास में ये कुछ वर्ष काले अक्षरों से लिखे जाएंगे। लिखने वाले फर्जी बुध्दिजीवी नहीं होंगे बल्कि इतिहास के असली लेखक होंगे और इतिहास कभी फर्जी लोगों को माफ नहीं करता।

माओवाद से निपटने का, जैसा कि पहले कहा, एक ही रास्ता है और वह यह है कि उन्हें बारूद से उड़ा दिया जाए, जहां मिले वहां पेड़ पर फांसी से लटका दिया जाए, गर्दन कलम कर दी जाए या फिर सबसे पहले सुधरने का एक आखिरी मौका दिया जाए। सुधरने के अलावा बाकी सब तरीके वे हैं जिन्हें माओवादी खुद इस्तेमाल करते हैं। समाज को सुधारने के बहाने वसूली और समानांतर सरकार का अहंकार पालने वाले माओवादियाें को तो पाप लगना ही है, उनका साथ दे कर अपने आपको प्रगतिशील साबित करने वालों को तो नर्क ही नसीब होगा।