दीपक जलता रहा रात भर

18 फरवरी.

गाेपाल सिंह नेपाली

सृजन

तन का दिया, प्राण की बाती

दीपक जलता रहा रात भर।

दुख की घनी बनी अंधियारी, सुख के टिमटिम दूर सितारे

उठती रही पीर की बदली, मन के पंछी उड़-उड़ हारे

बची रही प्रिय की आंखों से, मेरी कुटिया एक किनारे

मिलता रहा स्नेह-रस थोड़ा, दीपक जलता रहा रात भर।

दुनिया देखी भी अनदेखी, नगर न जाना, डगर न जानी

रंग न देखा, रूप न देखा, केवल बोली ही पहचानी

कोई भी तो साथ नहीं था, साथी था आंखों का पानी

सूनी डगर सितारें टिमटिम, पंथी चलता रहा रात भर।

अगणित तारों के प्रकाश में, मैं अपने पथ पर चलता था

मैंने देखा गगन-गली में चांद सितारों को छलता था

आंधी में, तूफानों में भी, प्राण-दीप मेरा जलता था

कोई छली खेल में मेरी दिशा बदलता रहा रात भर।

मेेरे प्राण मिलन के भूखे, ये आंखें दर्शन की प्यासी

चलती रहीं घटाएँ काली, अम्बर में प्रिय की छाया सी

श्याम गगन में नयन जुड़ाए, जगा रहा अन्तर का वासी

काले मेघों के टुकड़ों से चांद निकलता रहा रात भर।

छिपने नहीं दिया फूलों को, फूलों के उड़ते सुवास ने

रहने नहीं दिया अनजाना, शशि को शशि के मंद हास ने

भरमाया जीवन को दर-दर, जीवन की ही मधुर आस ने

मुझको मेरी आंखों का ही, सपना छलता रहा रात भर।

होती रही रात भर चुपक आंखमिचौली शशि-बादल में

लुकते-छिपते रहे सितारे अम्बर के उड़ते आंचल में

बनती-मिटती रहीं लहरियां जीवन की यमुना के जल में

मेरे मधुर मिलन का क्षण भी पल-पल टलता रहा रात भर।

सूरज को प्राची में उठकर पश्चिम ओर चला जाना है

रजनी को हर रोज रात भर तारक-दीप जला जाना है

फूलों को धूलों में मिलकर जग का दिल बहला जाना है

एक फूंक के लिए, प्राण का दीप मचलता रहा रात भर।

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