प्रेम रंग गाढ़ा - वीरेन्द्र मेहन्दीरत्ता

19 अप्रैल

 

बहुत हैरानी के साथ उसके चेहरे की ओर देखता ही रह गया, जब पत्नी ने बड़े निश्चय के साथ कहा, ''अब और कोई रास्ता नहीं, अकेले ही दिल्ली हो आती हूँ।'' ऐनक के शीशों में से झाँकती आँखों में संकल्प की चमक थी। खुले सफेद बालों को वह जूड़े के रूप में गाँठ दे रही थी। होठों में कसावट थी, जिससे सामने का टूटा हुआ दाँत नजर नहीं आ रहा था।

''दिल्ली और अकेले, नॉट पासीबल, और साठ साल की इस उमर में, जबकि पहले कभी गई नहीं। ''

''वह तो ठीक है, पर अब तो मुझे जाना है। कुक्कू कैंसर का ऑपरेशन करवाने बम्बई जा रहा है और उसे सिर्फ दो दिन के लिए दिल्ली रुकना है... और इन्हीं दिनों बेटे रवि की परीक्षाएँ हैं... हममें से किसी एक का वहाँ होना भी जरूरी है... सो अकेले ही जाना पड़ेगा''

 

''मेरी तो बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा, अकेले कैस जाओगी, हमारी शादी को चालीस साल हो गए हैं, कभी अकेले गई हो, जब भी दोनों साथ नहीं जा सके...तुम गई ही नहीं, भतीजे सुभाष की शादी पर नहीं गई, अपने फूफा की मौत पर नहीं गई... और ऐसे कितने ही मौके हैं, जिनके उलाहने झेलती हो'' ''वह बात दूसरी थी, परंतु कुक्कू तो मुझे बेटे रवि की तरह प्यारा है, उसे ऑपरेशन से पहले जरूर मिलना चाहती हूँ, किसी भी हालत में। ''

 

''वह तो ठीक है, पर...''

''पर किंतु, कुछ भी नहीं, मुझे जाना ही है।''

''ठीक है, कोई रास्ता निकालते हैं।''

''रास्ता क्या?''

''यही दो-चार मिलने वालों से पूछते हैं, शायद उन्हीं दिनों कोई दिल्ली जाने वाला मिल जाए।''

''हॉ, यह ठीक है।''

टेलीफोन घुमाते हुए कितने ही परिचितों से पूछा। कोई नहीं जा रहा था। ध्यान आया पंचकूला में मिस्टर चावला ने अभी-अभी इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का काम शुरू किया है। फोन अभी लगा नहीं। वे अक्सर दिल्ली जाते हैं। उनसे पंचकूला जाकर ही पता करना पड़ेगा। वहाँ जाना भी बेकार रहा।

 

''आप बेकार में इतनी फिकर कर रहे हैं, शताब्दी में मेरी बुकिंग करवा दीजिए, स्टेशन से स्कूटर लेकर चली जाऊँगी राजेन्द्र नगर। ''

''वैसे तो ठीक है, तुम्हारी उमर की पढ़ी-लिखी औरतें दुनिया का चक्कर भी लगा आती हैं... पर अकेले कभी गई नहीं। खैर, भरा जी को टेलीफोन कर दूँगा, वे तुम्हें स्टेशन पर मिल जाएंगे।''

''उन्हें किसलिए तकलीफ देंगे। वे आप से भी पांच साल बड़े हैं, उन्हें इस उमर में गाड़ी चलाने में तकलीफ होती होगी।''

 

''कोई बात नहीं, मेरी तसल्ली हो जाएगी।''

शताब्दी की टिकट लेकर घर पहुँचा ही था कि विमला की हिदायतें शुरू हो गईं, ''देखिए, सुबह वक्त से दूध जरूर ले लीजिएगा।''

''ले लूँगा, तुम चिन्ता मत करो।''

''दूध तो लेंगे, पर दही कैसे जमायेंगे... अच्छा, आज रात आपको समझा दूँगी।''

''ठीक है।''

''तीन-चार तरकारियाँ बना जाऊँगी, बस उन्हें गर्म करवा लें।''

 

''वैसे ठीक है, पर हरीश भले ही उमर में छोटा है, पर दाल वगैरह तो बना लेता है, गुजर हो जाएगी।''

''दाल बनवा लें, पर सब्जियाँ मैं बना जाऊँगी। गर्मिया में दूध बहुत जल्दी खराब हो जाता है, उसे औटाकर जल्दी ही फ्रिज में रख लिया कीजिएगा।''

''ठीक है।''

''कूलर को सुबह भरवा लीजिएगा, हरीश कई बार भूल जाता है... रवि सुबह ठंडा दूध पीता है, लौटने से पहले उसके लिए दूध रख लीजिएगा।''

''अच्छा''

''जमादारनी जब सफाई के लिए आए तो हरीश को कहिए, साथ-साथ रहे।... सारा घर अच्छी तरह साफ करें।''

''हो जाएगा, सब हो जाएगा।''

 

''अरे हाँ, नाश्ते के साथ विटामिन बी लेना भूलिएगा नहीं, अक्सर आप भूल जात है। ''

''दो दिन की तो बात है, इतनी चिंता क्यों कर रही हो। हरीश के साथ आई विल मेनेज एवरीथिंग।''

और जब मैं उसे स्टेशन छोड़ने गया तो घर से चलने से पहले पूछा, ''टिकट पर्स में रख ली है।''

पर्स खोलकर उसने देखा और बाेली, ''हाँ।'' स्टेशन जाते हुए रास्ते में निगाह उसके चेहरे की ओर गई, ''अरे दाँत तो तुमने पहना नहीं।'' सामने के टूटे दाँत को छोटा सा डेंचर वह घर नहीं पहनती, किन्तु बाहर जाते ही जरूर डाल लेती है।

 

''पहना नहीं, किन्तु पर्स में रख लिया है।''

''आँखों की दवाई?''

''रख ली है।''

''पैसे संभाल लिए हैं।''

''हाँ पर्स में हैं।''

''और पैसों की जरूरत हो, चेक बुक लेती जाओ, भरा जी से ले लेना।''

''काफी है।''

''किसी कारण भरा जी स्टेशन न पहुंच सके, तो क्या करोगी।''

''टेलीफोन कर दूँगी।''

''टेलीफोन नम्बर नोट कर लिया है?''

''कर लिया है।''

''कहाँ?''

''डायरी में।''

डायरी कहाँ रखी है, चैक कर ली।''

''पर्स में है।''

 

''भरा जी को मैंने फोन पर तुम्हारा बोली नम्बर, सीट नम्बर सब बता दिया है। अपने कम्पार्टमेंट के सामने ही रहना, इधर-उधर नहीं जाना।''

''ठीक है, आप बिल्कुल फिकर न करें।''

''अपने पर्स का ध्यान रखना।''

''देखिए, इसी तरह बगल में दबाये रखूँगी।''

लौटने का जब भी प्रोग्राम बने, भरा जी को कहकर टिकट मँगवा लेना।''

''सब कर लूँगी, पर आप ठीक से नाश्ता करके यूनिवर्सिटी जाना।''

''गाड़ी से उतरते समय टाँगों में तकलीफ हो तो किसी सवारी से हेल्प ले लेना।''

''आर्थराइट्स की यही तो मुसीबत है।''

 

''कोई ऐसी मुसीबत नहीं। सफर में लोग एक-दूसरे की बहुत मदद करते हैं। लो, गाड़ी आ गई और यह रही तुम्हारी बोगी नम्बर पाँच। तुम्हारा सीट नम्बर 62, यह पीछे के दरवाजे के पास होगा।''

उस दरवाजे के पास बहुत भीड़ नहीं थी। बोला, ''साथ का डंडा पकड़ कर चढ़ी इंडिपेंडेंटली... शाबाश, अब मेरी तसल्ली हो गई, इसी तरह उतर जाना।''

''आप भी कमाल करते हो, इतनी बूढ़ी थोड़े हो गई हूँ कि गाड़ी नहीं चढ़ पाऊँगी।''

''चलो, चलो, अस्सी, पचहत्तर...और यह रही तुम्हारी सीट।''

''टिकट चैक कर लो, पर्स में है न।''

''अभी तो चैक की थी। आप कहते हैं तो फिर देख लेती हूँ।''

निकालकर दिखाते हुए, ''यह रही टिकट और अब पर्स में रख ली। ठीक है।''

''वहाँ पहुंचकर फाेन कर देना।''

''जरूर कर दूँगी।''

''बेस्ट ऑफ जर्नी।''

''थैंक यू, अब आप चलें, चेयर कार में पता ही नहीं चलता कब गाड़ी चल पड़ती है खड़े-खड़े मेरी ओर क्या देख रहे हैं?''

''सोच रहा था अगर तुम दाँत डाल लेती तो...''

''इतनी उमर हो गई, अभी तक...''

विमला के चेहरे पर एक मीठी-सी मुस्कराहट फैल गई, ''आप जाते क्यों नहीं?''

''जा रहा हूँ।'' और मैं बाहर निकलने वाले दरवाजे की ओर चल पड़ा। दो चार कदम ही रखे थे कि पीछे से आवाज आई, ''जी जरा सुनो।''

''कहो।'' मैं मुड़कर उसके पास आया।

मुस्कान फिकरमंद रेखाओं में बदल चुकी थी और बोली, ''अपना ध्यान रखिएगा।''

 

वीरेन्द्र मेहन्दीरत्ता

696, सेक्टर-11 बी

चंडीगढ़- 160011

फोन - 2747697

 

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