बहुत दिनों के बाद

08 मार्च.

कुँवर बेचैन

 

बहुत दिनों के बाद

खिड़कियाँ खोली है

आे वासन्ती पवन हमारे घर आना।

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में

धूल भरे थे आले सारे कमरों में

उलझन और तनावों के रेशों वाले

पुरे हुए थे जाले सारे कमरों में

बहुत दिनों के बाद

साँकले डोली हैं

ओ वासन्ती पवन हमारे घर आना।

एक थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में

मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में

लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले

मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में

बहुत दिनों के बाद

खुशबुएँ घोली हैं

ओ वासन्ती पवन हमारे घर आना।

पतझर ही पतझर था मन के मधुवन में

गहरा सन्नाटा-सा था अन्तर्मन में

लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुँडेरी पर

चिन्तन की छत पर, भावों के आँगन में

बहुत दिनों के बाद

चिराइयाँ बोली हैं

ओ वासन्त पवन हमारे घर आना।

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