महेश कटारे 'सुगम' की ग़ज़लें

28  जुलाई

 

परिचय महेश कटारे सुगम बुन्देली ग़ज़लों के प्रथम और चर्चित रचनाकार हैं। उनकी ग़ज़लें मानवीय संवेदना और यथार्थ को अभिव्यक्त कर समाजी विकृतियां और कुरीतियों पर मारक चोट करती हैं। प्रमुख हिंदी पत्र ,पत्रिकाओं में उनकी कहानियों और कविताओं का निरंतर प्रकाशन होता रहता है। आकाशवाणी ग्वालियर एवं दूरदर्शन भोपाल से रचनाओं का प्रसारण हुआ है। उनकी प्रकाशित कृतियां -प्यास (कहानी संग्रह) गांव के गेंवड़े (बुंदेली ग़ज़ल संग्रह) हरदम हँसता जाता नीम (बाल गीत संग्रह) तुम कुछ ऐसा कहो (नवगीत संग्रह) वैदेही विषाद (लम्बी कविता) आवाज़ का चेहरा (ग़ज़ल संग्रह ) हैं। महेश कटारे सुगम का रचना संसार (डॉ .संध्या टिकेकर द्वारा संपादित) पुस्तक भी प्रकाशित हुई है। उन्हें कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें स्वदेश कथा पुरस्कार, स्व. बिजू शिंदे कथा पुरस्कार, कमलेश्वर कथा पुरस्कार (मुंबई) पत्र पखवाड़ा पुरस्कार (दूरदर्शन) जय शंकर कथा पुरस्कार (उप्र) डॉ. राकेश गुप्त कविता पुरस्कार, स्व .मुकीम पटेल रासिख सम्मान, रम्भा श्री सम्मान, आर्य स्मृति साहित्य सम्मान (किताब घर) स्पेनिन साहित्य सम्मान (रांची) शामिल हैं। रत्न सागर दिल्ली द्वारा प्रकाशित माध्यमिक पाठ्यक्रम के छठे भाग में उनकी 'बंजारे' नामक कविता संग्रहित है। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग में प्रयोगशाला तकनीशियन के पद से स्वेच्छिक सेवा निवृति ली है। हम यहां उनकी कुछ चर्चित ग़ज़लें प्रस्तुत कर रहे हैं।

ग़ज़ल-1

मिली प्रेम की पहली पाती अय, हय, हय
ख़ुशी बनी झरना बरसाती अय, हय, हय

खिली चांदनी चंदा दूल्हा लगता है
तारे लगते बने बराती अय, हय, हय

ठुमुक ठुमुक कर चलें बयारें बासंती
फूल खिले बगिया मुस्काती अय, हय, हय

सागर की छाती पर नाच रहीं लहरें
रेत बनी दुल्हन शर्माती अय, हय, हय

फूलों से श्रंगार किया है क्यारी ने
खुशबू वाले छंद सुनाती अय, हय, हय

फूट कोंपलें हंसती हैं बच्चों जैसी
लाल लाल पलकें झपकाती अय, हय, हय

ग़ज़ल-2

तुम खुद खों हुक्काम समझ रये
जनता खों हज्जाम समझ रये

काम कमीशन खावे हो रये
जौ जनता कौ काम समझ रये

मारत फिर रये निर्दोषंन खों
ई खों तुम इस्लाम समझ रये

जब चाहौ मिल जात तुम्हें सो
आंधी वारे आम समझ रये

सबरे तुम पै थूँकत फिर रये
ई में अपनौ नाम समझ रये

मौ अंध्यारे सें पी रये हौ
भुंसारे खों शाम समझ रये

ग़ज़ल-3

गांव में रै वौ पाप समझ रये
हमें अंगूठा छाप समझ रये

लम्बे कुर्ता पैर कें खुद खौ
बुद्धिमान कौ बाप समझ रये

एकइ सौ क़ानून सबई खौ
बात काय नईं साफ़ समझ रये

जी सें खून उबल र औ सब कौ
नईं वौ असली ताप समझ रये

अक्कल पै पथरा पर गए हैं
खुश हाली अभिशाप समझ रये

समझा रये सो मानत नईंयाँ
सब वे अपने आप समझ रये

बुकरेलू के कान काट रये
और शेर खौ माफ़ समझ रये

ग़ज़ल-4

बैठे हौ भगवान भरोसें बैठे रऔ
तक़लीफ़न की लयें खरोंचें बैठे रऔ

हरे करत रऔ दिल के गैरे घावन खौं
अँसुआ अपने पालें पोसें बैठे रऔ

आहै कौनऊँ और तुमें राजा कर जै
झूठी ऐसी बातें सोचें बैठे रऔ

चाहौ जी खौं ऊ के लानें कोसत रऔ
उठत हिया की हूकें रोकें बैठे रऔ

छोड़ घिसटवौ पाँवन चलवौ सीखौ अब
नईं पाँवन में कीलें ठोकें बैठे रऔ

बचा सकौ तौ बचा लेओ हम कै रये हैं
नईं तर अपनी इज़्ज़त खोकेँ बैठे रऔ

ग़ज़ल-5

मैंनत कर कर हारे भैया कैसें होंय गुजारे
में गाई नें मारे भैया कैसें होंय गुजारे

नींद उचट गयी है रातन की लेत करोंटा काटें
दिन में दीखें तारे भैया कैसें होंय गुजारे

आलू प्याज टमाटर देखें निकरौ एक जमानौ
अँसुआ पी रये खारे भैया कैसें होंय गुजारे

तेल डार कानन में बैठे बड़े बड़े हौदन पै
नई सुन रये हत्यारे भैया कैसें होंय गुजारे

तीन साल सें फसल आई नई मुठी में धेला नंईयां
मोड़ी बैठी क्वारी भैया कैसें होंय गुजारे

ग़ज़ल-6

हो हो कें हैरान मरौ है
फांसी लगा किसान मरौ है

मरतौ नईं तौ फिर का करतौ
फसलन कौ मीज़ान मरौ है

अन्न उगा कें पेट भरततौ
भूखन कौ वरदान मरौ है

गांव गांव में जाकें देखौ
खेत और खरयाँन मरौ है

ऊ के तौ हिरदे सें पूछौ
जी कौ बेटा ज्वान मरौ है

राजनीत वारे का जानें
मेंनत कौ औसान मरौ है

जे जिन जानौ मरौ अकेलौ
पूरौ हिंदुस्तान मरौ है

सुगम निक्क्मी सरकारन कौ
भुगत भुगत भुगतान मरौ है

मीज़ान =व्यवस्था /औसान =हौसला

ग़ज़ल-7

खर्चा में आमद है ऐसें
ऊँट के मौ में जीरौ जैसें

शैर में मौड़ा,मौड़ी पढ़ रये
हमसें पूंछौ कैसें कैसें

भाटे खों आबाद करौ है
लैकें, दैकें, जैसें, तैसें

मेंनत तौ अब करनें परहै
काम न चलहै ऐसें, वैसें

व्याव काज ,दुःख बीमारी में
बिक गऔ गानौ ,गैयाँ,भैंसें

आमद =आमदनी / शैर =शहर /मौड़ा मौड़ी =लड़का, लड़की /भाटा = परती ज़मीन / गानो =जेवर

ग़ज़ल-8

सब लुटेरे अब पुजारी हो गए
और गिरगिट शाकाहारी हो गए

भीख लेकर बन गए सरकार कुछ
भीख देकर हम भिखारी हो गए

चाहते हैं उसका करते हैं शिकार
अब तो वे अच्छे शिकारी हो गए

भीड़ का हिस्सा बने हैं हम सभी
और वे बढ़िया मदारी हो गए

युवतियों को छेड़ना होता गुनाह
वो मगर बांके बिहारी हो गए

ग़ज़ल-9

सारे बगुले ध्यान लगा कर बैठे हैं
मीनों पर वे नज़र गढ़ा कर बैठे हैं

वादों की पकड़ा दी लॉलीपॉप हमें
खुद सुविधा की कोख में जाकर बैठे हैं

मंहगाई सुरसा जैसा मुंह फाड़ रही
पर वे अपना ठाठ बना कर बैठे हैं

चारों ओर तबाही का आलम लेकिन
वे तो मुंह में दही जमाकर बैठे हैं

पका रहे साज़िश की खिचड़ी रोज़ मगर
देशभक्ति का खोल चढ़ा कर बैठे हैं

ग़ज़ल-10

बाबा नागार्जुन को स्मरण करते हुए
चकिया ने पीसा है आटा बहुत दिनों के बाद
आज बना है घर में खाटा बहुत दिनों के बाद

प्याज, टमाटर, धनियां पत्ती, नमक, मिर्च के साथ
बट्टे ने चटनी को बांटा बहुत दिनों के बाद

भरे पेट की आईं डकारें तृप्ति हुई मन में
करने निकले सैर सपाटा बहुत दिनों के बाद

पूंछ हिलाती जीभ निकाले फिरे सूंघती कुछ
कुतिया ने चकिया को चाटा बहुत दिनों के बाद

आज चैन की नींद सोयेंगे खर्राटे लेकर
सोचा जाये भाड़ में घाटा बहुत दिनों के बाद

सबके चेहरे खिले खिले से बच्चे उछल रहे
घर का फिर टूटा सन्नाटा बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद ख़ुशी के कदम पड़े घर में
आया सुगम सुखद बार्राटा बहुत दिनों के बाद

खाटा =हरी सब्ज़ियों वाली कढ़ी / बट्टे =पीसने वाला पत्थर / बार्राटा =स्वप्न /

ग़ज़ल-11

ख़ुशी तो है बहुत छोटी मेरे अवसाद के आगे
व्यंजन कुछ नहीं हैं रोटियों के स्वाद के आगे

सुखों से ख़ास रिश्ता है लिपे कच्चे घरोंदे का
बड़ा बेफिक्र दिखता है किसी प्रासाद के आगे

हमारा हौसला जिसको दबाना भी है नामुमकिन
खड़ा रहता है जो तनकर किसी प्रतिवाद के आगे

मनाते हैं हमेशा जश्न हम अपने अभावों का
मगर झुकते नहीं हरगिज़ किसी इम्दाद के आगे

कोई भी सल्तनत देखी गयी मेहमान दो दिन की
नहीं टिकती फकीरी की पड़ी बुनियाद के आगे

हुनर के वास्ते सब कुछ लुटाने की है ज़िद अपनी
बड़ा कुछ भी नहीं होता सुगम औलाद के आगे

 

ग़ज़ल-12

नहीं पहुंची किसी मज़लूम के बेबस ठिकानों तक
सिमट कर रह गयी सारी तरक्की बेईमानों तक

पढ़े जब आयतें मस्जिद तो मंदिर को मज़ा आये
पहुँचना चाहिए आवाज़ घंटी की अज़ानों तक

दिखाया जा रहा है ज़िंदगी को इश्तहारों में
सुबूते ज़िंदगी अब कैद है केवल दुकानों तक

सदी अट्ठारवीं की ओर ही ले जा रहे हमको
वो रखना चाहते सबको कुरआं,वेदों ,पुरानों तक

गए राजा सियासत में नए सामंत आ बैठे
सिमट कर रह गयी सत्ता''' सुगम'' ऊंचे घरानों तक
 

सम्पर्क -काव्या,चन्द्र शेखर वार्ड बीना, जिला-सागर (म प्र)-४७०११३ मोब .-09713024380

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