गांठें

10 फरवरी.

नरेश कौशिक

पता नहीं रात के कितने बजे थे। सुनंदा अधनींदी सी हालत में उठी आैर बिना लाइट आॅन किए ही बाथरूम की ओर बढ़ी। उसने बाथरूम का दरवाजा हल्का सा बंद किया और लाइट जलाकर सलवार का इजारबंद खोलने लगी। पेशाब का बहुत तेज प्रेशर था। सलवार का इजारबंद ढीला करने के लिए गांठ खोली, लेकिन फिर भी सलवार नीचे नहीं हुई। नीचे क्यों नहीं सरक रही है। पेशाब का प्रेशर है कि ब्लैडर फटने को हा रहा है। उसने थोड़ा ध्यान से देखा। इजारबंद में सैंकड़ों गांठें लगी हुई हैं। वह बदहवास सी एक के बाद एक गांठ खोलने लगी। हर एक गांठ खुलती और उसके हांफने की रफ्तार बढ़ती जाती। एक गांठ, दूसरी गांठ, तीसरी गांठ, चौथी गांठ, पांचवी गांठ...कमरे में घुप्प अंधेरा था और बिस्तर पर पड़ी सनुंदा की देह सुन्न थी लेकिन सांस धौंकनी की तरह तेज-तेज चल रही थी। अचानक उसकी आंख खुली तो उसने सांसों पर काबू पाने की कोशिश की। गला सूख रहा था। मन किया साइड टेबल से बोतल उठा कर पानी पी ले लेकिन शरीर मानों पत्थर हो गया था। दिसंबर की सर्द रात में भी माथे पर पसीनें की बूंदें महसूस हुई। ना जाने कितने मिनट बीतने पर उसे अहसास हुआ कि वह सपना... देख रही थी। फिर वहीं सपना उसने पास ही बिस्तर पर सोए बच्चों और पति की ओर देखकर सोचा, पता नहीं कितनी रात बीती है। 40 साल का लंबा अरसा बीत गया। यही सपना ना जाने उसे कितनी बार ऐसे ही नींदों में हफा चुका है। अब तो गिनना ही छोड़ दिया है। सुनंदा ने बिस्तर से उठ पानी पिया और फिर रजाई ओढ़ कर लेट गई। बेहद थकान महसूस हो रही थी। हर बार जब यह सपना दिखाई देता है तो उसके बाद उसे कई दिनों तक अपना शरीर ऐसे ही टूटा सा महसूस होता है। वह बिस्तर पर पड़े पड़े सोचने लगी, कितने जतन करके वह अपनी जिदंगी को उस मोड़ से आगे ले आई है लेकिन यह एक सपना ही उसका पीछा नहीं छोड़ता। ये सपना कब तक उसे यूं ही डराता रहेगा? क्या इस सपने की कोई उम्र नहीं है...? वो चाहती थी कि ये सपना बूढ़ा हाेकर दम तोड़ दे। वो खुद कितनी बार इस सपने को मारने की कोशिश कर चुकी है लेकिन चालीस सालों में तो इसमें सफल नहीं हो पाई। पास में सोए आठ साल के बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर नजरें खिड़की के परदों से झिरकर आती हल्की सी रोशनी पर टिका दी। खुली आंखें कोई सपना नहीं देख रही थी बल्कि उस बीते दिन को किसी देखी हुई फिल्म की तरह दोबारा दोहरा रही थी जिस दिन इस भयानक सपने ने जन्म लिया था।

छोटे से कमरे मं एक चारपाई, एक अलमारी में कुछ स्टील के बर्तन और एक कोने में रखा मिट्टी तेल का स्टोव। इस एक छोटे से कमरे में रसोईघर से लेकर डायनिंग, ड्राइंगरूम, बेडरूम और लीविंग रूम सभी कुछ समाया हुआ था। चारपाई एक ही थी। बीमार बुआ गांव से आती, तो पापा, मां, छह साल की गुडि़या और दोनों छोटे भाइयों का बिस्तर जमीन पर लगता था। बुआ चारपाई पर सोती थीं। मामा या चाचा गांव से आते तो एक छोटे से लकड़ी के स्टूल को कपड़े से झाड़ कर उस पर चाय परोस दी जाती थी। इस दो मंजिला मकान के निचले हिस्से में मकान मालकिन और ऊपर के हिस्से में किरायेदार रहते थे। एक कमरे में एक सरदारनी आंटी और उनका पांच जनों का परिवार तो दूसरे कमरे में एक फौजी अंकल। साथ वाले कमरे में मोटी मकान मालकिन का दूर का कोई काना रिश्तेदार, बच्चे उसे काना मामा कहते थे। निचले तल पर पखाना और गुसलखान बने हुए थे। नहाने धोने के लिए भी नीचे ही जाती थी... तीनों बहन-भाइयों को कमरे में बंद करके। मां जब भी नीचे नहाने या कपड़े धाने जाती तो गुडि़या को समझाती, देतों दोनों भाइयों का ध्यान रखना और कमरे से बाहर मत निकलना। बीच वाला हरि तो किसी तरह मान जाता, लेकिन मां का लाड़ला छोटू रोते-राते मां के पीछे चल देता। गिरता पड़ता सीढि़यां उतरता और गुसलखाने के दरवाजे पर ही खड़ा रहता। चाहे मां को कपड़े धाेने में कितनी ही देर क्या न हो, वहीं डटा रहता। जिदंगी बड़ी खूबसूरत लगती थी। गुडि़या पहली क्लास में पढ़ती है। गुडि़या के स्कूल जाने के बाद मां दोनों छोटे भाइयों के साथ घर का काम संभालती। दोपहर में स्कूल से लौटकर गुडि़या खाना खाती और भाइयों के साथ खेल में लग जाती। उसकी पड़ोस में कोई हम उम्र सहेली नहीं थी। मां को वक्त मिलता तो मकान मालकिन की बेटियों के साथ स्वेटर बुनने बैठ जाती। एक दिन उसने भी जिद करके मां से कहा कि मुझे स्वेटर बुनना सिखाओ। मां ने झाडू की दो सीखों में कुछ फंदे डालकर गुडि़या को दिए और गुड़िया ने उल्टी सीधी कुछ सलाइयां बड़े मनोयोग से बनाई और शाम को पापा के दफ्तर से आने पर उन्हें दिखाई। पापा ने ऐसे ही बच्ची का मन रखने के लिए उसके इस अनगढ़े हुनर की तारीफ की तो गुड़िया को लगा, उसने कोई बड़ी सफलता हासिल नहीं की है। लेकिन पापा से बहुत प्यार है। इसीलिए पापा अगर उसे कभी साल छह महीने में बेटा कहकर पुकार लें तो गुड़िया निहाल हो जाती है और भाग भाग कर मां के काम में हाथ बंटाने की कोशिश करती है।

हरि बहुत छोटा है। स्कूल नहीं जाता अभी और छोटू तो है ही दो ढाई साल का। बगल वाले कमरे में रहने वाला फौजी अंकल कभी-कभार उससे बीड़ी का बंडल मंगवाने हैं तो एक रूपया ज्यादा देते हैं गुड़िया को टाफी खरीदने के लिए। इसीलिए वह फौजी अंकल को पसंद करती है। वे बच्चों को डांटते भी नहीं हैं लेकिन काना मामा उसे कुछ खास पसंद नहीं है। उसका उसे नहीं पता कि क्या काम करता है। कान के पीछे बीड़ी लगाकर घूमता रहता है। मकान मालकिन की सास का देहांत हुआ तो उन्होंने तेरहवीं पर लड्डू बनवाए और ढेरों रिश्तेदारों का खाना पीना हुआ। काने मामा के कमरे में लड्डू भरे पड़े थे। गुड़िया ने भी पंगत में बैठकर लड्डू खाए थे, लेकिन एक दो लड्डू से कहां पेट भरता। दावत तो खत्म हाे गई। गुड़िया के कमरे से सटा कमरा था काने मामा का। और इसीलिए लड्डुओं की महक और जी ललचाता रहा। दीवार के उस पार से महक आती रही और गुड़िया को सपन से लड्डू ही दिखत रहे। इसलिए अगले दिन दोनों भाई-बहन ने लड्डू चुराने की तिकड़म सोची। कमरा खुला देखकर गुड़िया हरि के साथ मामा के कमरे में घुस गई और दोनों बहन भाई एक-एक लड्डू उठाकर ले आए। गुड़िया ने भाई को सख्त हिदायत दी कि किसी को बताना नहीं। लेकिन उसने शाम को पापा के सामने सब पोल खोल दी और दोनों को जमकर डांट पड़ी। गुड़िया को मोटी मकान मालकिन भी अच्छी नहीं लगती। छोटू लकड़ी की पटरी की गाड़ी बनाकर फर्श पर घसीटता है तो नीचे से ही जोर से चिल्लाती है, अरे, छत ही गिरा दोगे क्या। फिर दनदनाते हुए आएगी और मां से कहेगी जानकी तू कोई और कमरा ढूंढ ले। मेरे बस का नहीं है तेरे बच्चों का शोरशराबा झेलना। मां नल पर पानी भरना छोड़कर भागते हुए आती और फिर छोटू को डांटती। कुल मिलाकर एक कमरे के इस घर में इसी तरह सुबह और शाम होती है। एक दिन स्कूल से घर पहुंची तो गुड़िया ने पाया कि बीच वाले मामा आए हुए हैं। वह बहुत खुश हुई। मामा तीनों भाई बहन को चुटकुले सुनाकर बहुत हंसाते हैं और बगल में हाथ दबाकर पाद मारने जैसी आवाज निकालते हैं। उस आवाज पर तो तीनों बहन भाई बहुत जोर-जोर से हंसते हैं। फिर मामा से कहते, मामा एक बार और मामा एक बार और... मामा वैसे तो बहुत अच्छे हैं लेकिन वहमी और पाखंडी एक नंबर के। रात को मां खाना परोसती तो कहते... अच्छा...ऐसा है... अब तुम तीनों बच्चे दूर एक कोने में जाकर बैठ जाओ, जब तक मैं खाना खाऊं। तीनों बहन-भाई एक कोने में बैठकर मामा के खाना खत्म करने का इंतजार करते। मामा घर के घड़े का पानी भी नहीं पीते थे। कहते, जानकी, तेरे घर का पानी शुद्ध नहीं है। तेरा छोटू जरूर उसमें पेशाब कर देता होगा। गुड़िया को मामा की इन्हीं बातों पर बस आग लग जाती और सोचती, इतना ज्यादा पंडित हैं तो जाते क्यों नहीं अपने घर। यहां क्या करने आते हैं। पापा ने मामा की नौकरी रेलवे में लगवाई है। क्या करेंगे वहां, पता नहीं लेकिन गुड़िया को केवल इतना पता है कि अब मामा उन्हीं लोगों के साथ इस एक कमरे के मकान में रहेंगे। वैसे तो गुड़िया को मामा अच्छे लगते हैं लेकिन वह जब खाने पीने को लेकर पाखंड करते हैं तो उसे गुस्सा अाता है। ऐसे ही एक दोपहरी गुडि़या स्कूल से आई तो मां नीचे गुसलखाने में कपड़े धो रही थी और छोटू हर रोज की तरह वैसे ही दरवाजे पर खड़ा था। स्कूल में उसे ग्लूकोज के बिस्कुट मिले थे। उसने दो बिस्कुट बस्ते में से निकाल कर भाई को दिए तो छोटू ने चुपचाप ले लिए और फिर गुसलखाने के दरवाजे पर मुस्तैद हो गया। मां ने कहा, जा ऊपर जाकर कपड़े बदल ले। मैं अभी आकर खाना देती हूं। गुड़िया सीढ़िया चढ़कर कमरे में पहुंची। उसने बस्ता एक और दीवार से सटा कर रखा और स्कूल की यूनिफार्म निकाल कर अलगनी पर टंगा फ्राक पहन लिया। हरि लेटा हुआ था। हाथ में प्लास्टर जो बंधा था। कल तिपाई पर पैर रखकर ऊपर अलमारी में से लेमन जूस निकालते हुए गिर गया था। हाथ टूट गया...और डांट पड़ी सो अलग। गुड़िया भाई के पास गई। बोली, बिस्कुट खाएगा। हरि ने ना में गर्दन हिला दी। उसने धीरे से भाई के कान में फुसफुसाया, दर्द हो रहा है? हरि कुछ नहीं बोला।

उसे बड़ी बोरियत सी लगी। हरि तो अब खेलेगा नहीं। देखा, मामा भी चुपचाप चादर ओढ़े लेटे हैं। तो क्या आज सिक्के वाला जादू नहीं होगा। उसने सोचा।

उसे जोरों की भूख लगी थी। मां का इंतजार बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उसने उठकर एक प्लेट में रोटी रखी और कटोरी में सब्जी डालकर फर्श पर बैठकर खाने लगी। खाना खत्म कर चुकी तो मामा ने बुलाकर चारपाई पर बिठा लिया।

गुड़िया को दिन में सोने की आदत नहीं है। गुड़िया ने मामा के पास लेटने से मना कर दिया। मामा ने धीरे से कहा, देख, चादर के अंदर आ। तुझे जादू दिखाता हूं। वह मामा के पास लेट गई और जादू दिखाए जाने का इंतजार करने लगी। मामा एक रुपए के सिक्के को गायब कर देते हैं और उसे यह खेल बड़ा पसंद है। वह सिक्के को कभी उसके कान से निकालेंगे तो कभी उसके नाक से और फिर तीनों बहन भाई जोर से हंसेंगे।

गुड़िया सिक्के के जादू का इंतजार कर रही थी कि उसे फ्राक के नीचे कच्छी में कुछ गीलापन महसूस हुआ। उसने चादर उघाड़ कर बाहर निकलना चाहा तो मामा ने धीमे से फुसफुसा कर कहा, देख तुझे एक बात बताता हूं। जब तू बड़ी हो जाएगी और बड़े स्कूल में जाएगी तो किसी लड़के बड़के से दोस्ती मत करना। उसके मुंह से अनायास निकल गया क्यों?

वो दोपहर तो बीत गई, लेकिन कई सारे क्यों...क्यों...क्यों? उसके लिए छोड़ गई। वो लिसलिसापन क्या था? अपने ही होने से इतनी घबराहट क्यों? मां से गुस्सा क्यों? हर चीज में गुस्सा क्यों?

गुड़िया बुरी तरह सहम गई अौर उसे अपने हाथ पैरों में जकड़न सी महसूस हुई। उसी वक्त मां कपड़ों भरी बाल्टी लिए कमरे में घुसी और बोली, गुड़िया...चल कपड़े सुखवाने में मेरी मदद कर।

सहमी और डरी हुई गुड़िया बाहर जाकर मां की मदद करने लगी। वह एक-एक कपड़ा पकड़ाती जाती और मां अलगनी पर टांगती जाती। धूप बहुत तेज थी। मां ने कहा...गुड़िया चप्पल पहन ले। पैर जल जाएंगे। लेकिन गुड़िया चुपचाप... बाल्टी में से कपड़े उठाकर मां को पकड़ाती रही।

उसे स्कूल में लगा लिसोढ़े का पेड़ याद आ गया। पेड़ से गिरे लिसोढ़े...छिलके के बीच से फूट कर निकलता लिसलिसा लिसोढ़ा। बच्चे पका लिसोढ़ा खाते थे। किताब फट जाती तो उसके चिपचिपे गोंद से पन्ने चिपकाते थे।

गुड़िया को ये कुछ ठीक नहीं लगा। वह दिनभर कनखियों से मामा को देखती रही। उसे पता नहीं क्यों...मां पर गुस्सा आ रहा था।

पापा की लाड़ली गुड़िया दिनभर उनके घर आने का इंतजार करती रही। शाम के समय मामा हरि के साथ खेल रहे थे। मामा ने अपने हाथ की मुठ्ठी बनाई और हरि से सबसे बड़ी उंगली पता लगाने को कहा।

हरि हंसता हुआ कोशिश में लगा था। कमरे के बाहर मुंडेर पर खड़ी गुड़िया पापा के आने का इंतजार कर रही थी। थोड़ी देर बाद हरि बाहर आया। उसने धीरे से हरि के कान में कहा, ...मामा, अच्छे आदमी नहीं हैं। देख, तूने अगर उनसे बात की तो मैं तेरे से कुट्टी हो जाऊंगी।

हरि कुछ समझा नहीं। उसने बस हां में सिर हिला दिया। शायद बहन की कुट्टी के डर से।

शाम हो चुकी थी। गुड़िया मुंडेर के पास खड़ी थी। फौजी अंकल भी काम से लौट चुके थे। हर रोज की तरह बीड़ी मंगवाने के लिए आज उन्हें नीचे आंगन में खेलती गुड़िया को आवाज नहीं लगानी पड़ी। लेकिन उसने बीड़ी का बंडल लाने के लिए जाने से मना कर दिया।

बुधवार का दिन था। सामने पड़ोसी के घर की छत पर टेलीविजन कमरे से बाहर निकाल कर रख दिया गया था। पड़ोस के सभी लोग वहां चित्रहार देखने को जुटते थे।

गुड़िया पूरी बेसब्री से बुधवार का इंतजार करती थी। वह टीवी पर नाचते गाते लोगों को देख हैरत में पड़ जाती थी। वह टेलीविजन देखने हुए यही सोचती, नाच गाकर ये लोग टेलीविजन में से कहां चले जाते हैं?

बचपन से वह गांव में दादी के पास रही थी। एक दिन पापा जब गांव गए तो दादी ने कहा था, अब इसकी स्कूल जाने की उम्र हो गई है। बेटा, तू कहे तो गांव के स्कूल में दाखिला दिला दूं। नहीं तो तू इसे अपने साथ ले जा। शहर में अच्छी पढ़ाई है।

पापा उसे शहर ले जाने को तैयार हो गए। लेकिन गुड़िया दादी को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी।

पड़ोस की छत पर लोगों की भीड़ जमा हाे गई थी। शाम की जगह रात ले रही थी। आंगन में अमरूद के पेड़ पर चिड़िया की चीं-चीं बंद हो गई थी। आज गुड़िया ने न स्टापू खेला, न मुंडेर पर दौड़ती चीटियां पकड़ी और न हरि के साथ झगड़ा किया।

शाम के समय सरदारनी आंटी अंडे की भुर्जी बनाती हैं। गुड़िया को उनके कमरे की देहरी पर खड़े होकर...आंटी का गिलास के किनारे पर मारकर अंडा तोड़ना...उसे गिलास में चम्मच डालकर फेंटना...और फिर पैन में डालकर चीले जैसा बनाते हुए देखना अच्छा लगता है।

गुड़िया अंडा नहीं खाती। उसके घर में कोई नहीं खाता। पहली बार उसने सरदारनी आंटी के घर पर ही अंडा देखा था और मां के पीछे पड़ गई थी। मुझे भी खाना है।

तब पहली बार उसे बताया गया कि वह ब्राह्मण है और ब्राह्मण अंडा नहीं खाते। सरदानी आंटी कहती, खाणा एक पुत्तर? और वह हंसते हुए ना में सिर हिला देती। आज वह सरदारनी आंटी के दरवाजे पर अंडे का आमलेट बनता देखने भी नहीं गई़ रात को रोज की तरह मां ने स्टोव पर खाना पकाना शुरू किया। गुड़िया अपनी कपड़े की गुड़िया को हाथ में पकड़े एक कोने में बैठी थी। छोटू भूख के मारे रो रहा था। मां ने पहले मामा को खाना परोसा। वो रात की ड्यूटी पर जाएंगे। मामा को खाना परोसती मां पर उसे फिर गुस्सा आया। साथ ही उसे दादी की याद आई। सर्दियों में दादी जब चूल्हे पर खाना पकाती थी तो गुड़िया को अपनी बगल में दुकनिये दोशाला में छुपा लेती थी। कहीं ठंड न लग जाए। दादी तवे से रोटी उतार कर भभकती आग में सेकती रोटी पर मक्खन लगाकर उसे देती। गुड़िया को रोटी खाते हुए दुकनिये की गर्माहट और दादी की महक बहुत अच्छी लगती और उसे बगल में दुबके-दुबके ही नींद आ जाती।

मामा से एक और रोटी खाने का इसरार करती मां को टोकते हुए गुड़िया ने कहा, मुझे दादी के पास जाना है। मां ने उसकी बात को सुना अनसुना करते हुए कहा, स्कूल कौन जाएगा? गुड़िया ने गुस्से से कहा, मुझे नहीं पढ़ना यहां। मुझे दादी के पास जाना है।

चकले पर मां रोटी को गाेल-गोल बेलती रही। मामा आराम से खाना खाते रहे। गुड़िया के मन में आया...स्टोव काे उठाकर पटक दे...नहीं...कहीं आग लग गई तो ... या फिर मामा के खाने में एक मुठ्ठी रेत डाल दें लेकिन पिटाई के डर से वह कुछ नहीं कर पाई। उसे फिर से दादी की याद आई।

मां ने हर रोज की तरह रात को दूध पीने के बाद गुड़िया से कहा, पेशाब करके सोना नहीं तो रात को बिस्तर गीला करेगी। वह बाहर नाली पर पेशाब करने गई तो उससे कच्छी का नाड़ा ही नहीं खुला। उसने मां को आवाज लगाई, मां नाड़ा नहीं खुल रहा है। मां झल्लाते हुए आई और कच्छी का नाड़ा खोलने लगी। मां खीझकर बोली... से नाड़े में इतनी गांठें क्यों लगा रखी हैं। देख तूने कितना कस के बांधा है, कमर पर कितना गहरा निशान पड़ गया है।

गुड़िया ने कुछ नहीं कहा, उसे याद आया दोपहर में चद्दर में से बाहर निकलने के बाद उसने सबसे पहला काम यही किया था। कच्छी में एक के बाद एक ना जाने कितनी गांठें कसकर लगा ली थी उसने। पेशाब करने के बाद वह जाकर पापा की बगल में लेट गई। रात को गुड़िया पापा के पास ही सोती थी। पापा ने हर दिन की तरह उसे आज भी एक राजा-रानी की कहानी सुनाई। कहानी खत्म हो गई तो उसने धीरे से पापा से कहा...पापा...मामा अच्छे आदमी नहीं हैं।

पापा हल्के से हंसते हुए बोले, क्यों? क्या मामा ने आज कान से सिक्का निकालने वाला जादू नहीं दिखाया? इतना कहकर वह गुड़िया को थपकी देकर सुलाने लगे। ये तो गुड़िया को खुद भी समझ नहीं आया कि मामा क्यों अच्छे आदमी नहीं हैं। हंसाते हैं, चुटकुले सुनाते हैं, जादू दिखाते हैं। लेकिन...वो अच्छे आदमी नहीं हैं।

उस दिन बंधी गांठों का हिसाब पता नहीं चला था। लेकिन अब लगता है...बहुत सी गांठें अभी भी खोलना बाकी हैं।

 

संपर्क : मुख्य उप संपादक, पीटीआई भाषा, पीटीआई बिल्डिंग, 4 संसद मार्ग, नई दिल्ली

Total votes: 55