जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं

02  अगस्त

परिचय

जितेन्द्र श्रीवास्तव मानवीय संंवेदना के कवि हैं। उनकी कविताओं में प्रेम अंतस में गहरे तक उभरता है। समाज की टूटन, बिखरन को भी वे गहराई से महसूस करते हैंं। उनकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

कविता संग्रह-अनभै कथा, इन दिनों हालचाल, असुंदर सुन्दर, बिलकुल तुम्हारी तरह, कायांतरण।

आलोचना-भारतीय समाज, 'राष्ट्रवाद और प्रेमचंद, शब्दों में समय, आलोचना का मानुष मर्म, सर्जक का स्वप्न, विचारधारा, नए विमर्श और समकालीन कविता, उपन्यास की परिधि।

संपादन- प्रेमचन्द: स्त्री जीवन की कहानियां, प्रेमचन्द: दलित जीवन की कहानियां, प्रेमचन्द: स्त्री आैर दलित विषयक विचार, प्रेमचन्द: हिन्दू-मुस्लिम एकता संबंधी कहानियां और विचार, प्रेमचन्द: किसान जीवन की कहानियां, प्रेमचन्द: स्वाधीनता आंदोलन की कहानियां, कहानियां रिश्तों की, पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

हिन्दी के साथ भोजपुरी भाषा में भी उन्होंने लेखन किया है। उनकी कुछ कविताएं अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उड़िया और पंजाबी भाषाओं में अनुदित हुई हैं। उनकी लंबी कविता सोनचिरैया की कई नाट‍्य प्रस्तुतियां की गई हैं।

उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें-भारत भूषण अग्रवाल सम्मान, देवीशंकर अवस्थी सम्मान, हिन्दी अकादमी दिल्ली का कृति सम्मान, उप्र हिन्दी संस्थान का रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार, उप्र हिन्दी संस्थान का विजयदेव नारायण साही पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद् पुरस्कार, रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान, परंपरा ऋतुराज सम्मान शामिल हैं।

1-इस गृहस्थी में

देखो तो कहाँ गुम हो गई रसीद !

देखो न

तुम तो बैठी हो चुपचाप

अब हँसों नहीं खोजो

बहुत ज़रूरी है रसीदों को बचाकर रखना

हम कोई धन्ना-सेठ तो नहीं

जो ख़राब हो जाएँ हाल-फिलहाल की ख़रीदी चीज़ें

तो बिसरा दें उन्हें

ख़रीद लाएँ दूसरी-तीसरी

हमारे लिए तो हर नई चीज़

किसी न किसी सपने का सच होना है

हमारे सपनों में कई ज़रूरी-ज़रूरी चीज़ें हैं

और ख़रीदी गई चीज़ों में बसे हैं कुछ पुराने सपने

उठो, देखो न कहाँ गुम हो गई रसीद !

उसे महज एक काग़ज़ का टुकड़ा मानकर

भुलाना अच्छा नहीं होगा

वह रहेगी तभी पहचानेगा शो-रूम का मैनेजर

कुछ पुराने-धुराने हो गए कपड़ों के बावजूद

उन्हें बदलना पड़ेगा सामान

वैसे अच्छा है

तुम मुझसे ज़्यादा समझती हो यह-सब

बड़े हिसाब-किताब से चलाती हो घर

लेकिन इस समय जब मैं हूँ बहुत परेशान

तुम बैठी हो चुपचाप

उठो, देखो न कहाँ गुम गई रसीद !

अरे, यह क्या

अब तो तुम्हारे होठों पर आ गई है शोख हँसी

लगता है ज़रूर तुमने सहेज कर रखा है उसे

अपने लॉकर वाले पर्स में

चलो इसी बात पर ख़ुश होकर

मैं भी हँस लेता हूँ थोड़ा-सा

यह अच्छा है इस गृहस्थी में

जो चीज़ें गुम हो जाती हैं मुझसे

उन्हें ढूँढ़कर सहेज देती हो तुम

मैंने अब तक किए हैं आधे-अधूरे ही काम

जो हो सके पूरे या दिखते हैं लोगों को पूरे

वे सब तुम्हारे ही कारण हैं

उनका सारा श्रेय तुम्हारा है ।

 

2-जो उतरता ही नहीं मन रसना से

घर से दूर ट्रेन में पीते हुए चाय

साथ होता है अकेलापन

वीतरागी-सा होता है मन

शक्कर चाहे जितनी अधिक हो

मिठास होती है कम

चाय चाहे जितनी अच्छी बनी हो

उसका पकापन लगता है कम

साधो! अब क्या छिपाना आपसे

यह जादू है किसी के होने का

यह मिठास है किसी की उपस्थिति की

जो उतरता ही नहीं मन-रसना से ।

 

3-अपनों के मन का (स्व० भवानी प्रसाद मिश्र को याद करते हुए)

मैं कवि नहीं झूठ फ़रेब का

रुपया-पैसा सोने-चांदी का

मैं कवि हूँ जीवन का सपनों का

उजास भरी आँखों का

मैं कवि हूँ उन होंठों का

जिनको काट गई है चैती पुरवा

मैं कवि हूँ उन कंधों का

जो धूस गए हैं बोझ उठाते

मैं कवि हूँ

हूँ कवि उनका

जिनको नहीं मयस्सर नींद आँख भर

नहीं मयस्सर अन्न आँत भर

मैं कवि हूँ

हाँ, मैं कवि हूँ

उन उदास खेतों के दुख का

जिसको सींच रहा है आँखों का जल

मैं कवि हूँ उन हाथों का

जो नहीं पड़े चुपचाप

जो नहीं काटते गला किसी का

जो बने ओट हैं किसी फटी जेब की

मैं कवि हूँ

जी हाँ, कवि हूँ

अपने मन का

अपनों के मन का ।

 

4-चुप्पी का समाजशास्त्र

उम्मीद थी

मिलोगे तुम इलाहाबाद में

पर नहीं मिले

गोरखपुर में भी ढूँढ़ा

पर नहीं मिले

ढूँढ़ा बनारस, जौनपुर, अयोध्या, उज्जैन, मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार

तुम नहीं मिले

किसी ने कहा

तुम मिल सकते हो ओरछा में

मैं वहाँ भी गया

पर तुम कहीं नहीं दिखे

तुम नहीं दिखे

गढ़ कुण्डार के खण्डहर में भी

मैं भटकता रहा

बार-बार लौटता रहा

तुमको खोजकर

अपने अन्धेरे में

न जाने तुम किस चिड़िया के खाली खोते में

सब भूल-भाल सब छोड़-छाड़

अलख जगाए बैठे हो

ताकता हूँ हर दिशा में

बारी-बारी चारों ओर

सब चमाचम है

कभी धूप कभी बदरी

कभी ठण्डी हवा कभी लू

सब कुछ अपनी गति से चल रहा है

लोग भी ख़ूब हैं धरती पर

एक नहीं दिख रहा

इस ओर कहाँ ध्यान है किसी का

पैसा पैसा पैसा

पद प्रभाव पैसा

यही आचरण

दर्शन यही समय का

देखो न

बहक गया मैं भी

अभी जो खोजने निकलना है तुमको

और मैं हूँ

कि बताने लगा दुनिया का चाल-चलन

पर किसे फ़ुर्सत है

जो सुने मेरा अगड़म-बगड़म

किसी को क्या दिलचस्पी है इस बात में

कि दिल्ली से हज़ार कि० मी० दूर

देवरिया ज़िले के एक गाँव में

सिर्फ़ एक कट्ठा ज़मीन के लिए

हो रहा है ख़ून-ख़राबा

पिछले कई वर्षों से

इन दिनों लोगों की समाचारों में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी है

वे चिन्तित हैं अपनी सुरक्षा को लेकर

उन्हें चिन्ता है अपने जान-माल की

इज़्ज़त, आबरू की

पर कोई नहीं सोच रहा उन स्त्रियों की

रक्षा और सम्मान के बारे में

जिनसे सम्भव है

इस जीवन में कभी कोई मुलाक़ात न हो

हमारे समय में निजता इतना बड़ा मूल्य है

कि कोई बाहर ही नहीं निकलना चाहता उसके दायरे से

वरना क्यों होता

कि आज़ाद घूमते बलात्कारी

दलितों-आदिवासियों के हत्यारे

शासन करते

किसानों के अपराधी

सब चुप हैं

अपनी-अपनी चुप्पी में अपना भला ढूँढ़ते

सबने आशय ढूँढ़ लिया है

जनतन्त्र का

अपनी-अपनी चुप्पी में

हमारे समय में

जितना आसान है उतना ही कठिन

चुप्पी का भाष्य

बहुत तेज़ी से बदल रहा है परिदृश्य

बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं निहितार्थ

वह दिन दूर नहीं

जब चुप्पी स्वीकृत हो जाएगी

एक धर्मनिरपेक्ष धार्मिक आचरण में

पर तुम कहाँ हो

मथुरा में अजमेर में

येरुशलम में मक्का-मदीना में

हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाती किसी ट्रेन में

अमेरिकी राष्ट्रपति के घर में

कहीं तो नहीं हो

तुम ईश्वर भी नहीं हो

किसी धर्म के

जो हम स्वीकार लें तुम्हारी अदृश्यता

तुम्हें बाहर खोजता हूँ

भीतर डूबता हूँ

सूज गई हैं आँखें आत्मा की

नींद बार-बार पटकती है पुतलियों को

शिथिल होता है तन-मन-नयन

पर जानता हूँ

यदि सो गया तो

फिर उठना नहीं होगा

और मुझे तो खोजना है तुम्हें

इसीलिए हारकर बैठूँगा नहीं इस बार

नहीं होने दूँगा तिरोहित

अपनी उम्मीद को

मैं जानता हूँ

ख़ूब अच्छी तरह जानता हूँ

एक दिन मिलोगे तुम ज़रूर मिलोगे

तुम्हारे बिना होना

बिन पुतलियों की आँख होना है ।

 

5-कायांतरण

दिल्ली के पत्रहीन जंगल में

छाँह ढूँढ़ता

भटक रहा है एक चरवाहा

विकल अवश

उसके साथ डगर रहा है

झाग छोड़ता उसका कुत्ता

कहीं पानी भी नहीं

कि धो सके वह मुँह

कि पी सके उसका साथी थोड़ा-सा जल

तमाम चमचम में

उसके हिस्से पानी भी नहीं

वैसे सुनते हैं दिल्ली में सब कुछ है

सपनों के समुच्चय का नाम है दिल्ली

बहुत से लोग कहते हैं

उन्हें पता है

कहाँ क़ैद हैं सपने

लेकिन निकाल नहीं पाते उसे वहाँ से

हमारे बीच से ही

चलते हैं कुछ लोग

देश और समाज को बदलने वाले सपनों को क़ैदमुक्त कर

उन्हें उनकी सही जगह पहुँचाने के लिए

लोग वर्षों ताकते रहते हैं उसकी राह

ताकते-ताकते कुछ नए लोग तैयार हो जाते हैं

इसी काम के लिए

फिर करते हैं लोग

इन नयों का इंतज़ार

पिछले दिनों आया है एक आदमी

जिसका चेहरा-मोहरा मिलता है

सपनों को मुक्त कराने दिल्ली गए आदमी से

वह बात-बात में वादे करता है

सबको जनता कहता है

और जिन्हें जनता कहता है

उन तक पहुँची है एक ख़बर

कि दिल्ली में एक और दिल्ली है- लुटियन की दिल्ली

जहाँ पहुँचते ही आत्मा अपना वस्त्र बदल लेती है ।

संपर्क- हिंदी संकाय, मानविकी विद्यापीठ, ब्लॉक-एक, इग्नू, मैदान गढ़ी, नईदिल्ली -68

E-MAIL-jitendra82003@gmail.com

m-09818913798

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