सुशीला शिवराण की कविताएं

30 जून

परिचय:

सुशीला शिवराण समकालीन रचनाकारों में एक महत्वपूर्ण नाम है। उनकी रचनाएं निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। देशभर की विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के अलावा विदेशों में भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं।

नेपाल से प्रकाशित पत्रिका ‘नेवा’में उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं, साथ ही नेपाल की ‘शब्द-संयोजन’ पत्रिका में नेपाली भाषा में उनकी कविताएं अनुदित हुई हैं। कनाडा से निकलने वाली ‘हिंदी चेतना’ पत्रिका में भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं।

मॉरिशस में उनकी कविताओं की प्रस्तुति पर छात्राओं को दो वर्ष से अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त हो रहा है। प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्‍मेलन, गुड़गाँव, निदान फ़ाउंडेशन दिल्ली तथा के.बी.एस. प्रकाशन द्‍वारा साहित्य-सृजन के लिए सम्मानित किया गया है।

उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं।



बारिश का दर्द

कल शाम
बेकल-सी
अनमनी-सी बारिश
उतरी अंबर से
लाई साथ
कुछ उलाहने
कुछ इल्ज़ाम
बोली कलम थाम
चाहती हूँ रिहाई
इन पुर्ज़ों की कैद से



मत बाँधो मेरे हुस्‍न को
जुल्फ़ों पर गिरी बूँदों में
नहाई-झूमती फ़सलों
नम फूलों-कलियों की
पाकीज़ा खूबसूरती हूँ मैं



सौंधी मिट्‍टी की महक में
मोर की थिरकन में
नंग-धड़ंग बच्‍चों के हुड़दंग में
मैं तो उमंग हूँ
बेहिसाब मतवाली !



टिन की छत पर
बजती हूँ जलतरंग-सी
धड़कते दिलों को
मदहोश करता है
मेरा मादक संगीत
भीगती अमराइयों में
कोयल की कुहक में
पपीहे की टेर में
सावन के गीतों में
कजरी-मल्हार में
रूह से उठती तान हूँ
कभी सुनो तो सही



नाउम्मीद किसान की
पथराई आँखों में
उम्मीद हूँ ज़िंदगी की
मिट्टी में पड़े बीजों से
उगाती हूँ खुशियाँ
जो गाती हैं
सब से मीठे गीत !



फ़लक पर
बादलों के साथ
तमाम दुनिया के ख्व़ाब
कर देती हूँ इन्द्रधनुषी
मेरी बूँदों से भीग उठती है धरा
जो बन जाती है दुआ
ज़िंदगी के लिए



ख़ुदा का नूर हूँ
कागज़ पर नहीं
कायनात में हूँ
लफ़्ज़ों में नहीं
एहसासात में हूँ
इस सुरूर में
कभी बहो तो सही



बोलती रही बारिश
भीगती रहीं आँखें
बारिश के साथ
बारिश के दर्द में
इन बारिशों को
कभी पढो़ तो सही ।



__________________________

सुशीला शिवराण के दोहे

 

1. उमड़-घुमड़ के आ गए, बदरा ले के नीर ।
   संचित जो होती रही, ढुलका दी वो पीर ।।

2. बूँदों की सरगम बजी, बरस रहा है नेह ।
   धरा-गगन हुलसे मिले, छम छम बरसा मेह ।।

3. क्यों बैठे हो मौन तुम, कह दो मन की बात ।
   क्यों पथराई आँख हैं, क्यों भीतर निर्वात ।।

4. सीली-सीली रात में, तन्हा निकला चाँद।
   लहरें मचलीं बावरी, सागर करे निनाद ।।

5. जब तुम देखो प्यार से, मन में बजे मृदंग।
   ढाई आखर से उठें, तन में कई तरंग ।।

6. जीवन जीने का सखे ! बस इतना है सार ।
   जो चाहो ख़ुद के लिये, वैसा हो व्यवहार ।।

7. जीवन जीने का सखे ! बस इतना है सार ।
   जो चाहो ख़ुद के लिये, वैसा हो व्यवहार ।।

8. भट्टी में जलते गए, सपन हुए सब राख ।
   रधिया तेरा भाग भी, पिघले जैसे लाख।।

9. लूले-लँगड़े कायदे, अंधा है कानून ।
   घोटालों का राज है, सच भूखा दो जून।।

10. आरक्षण के खेल में, मतलब का कानून।
    हुनर भिखारी हो गया, मूरख अफ़लातून।।

11. साल-महीने हो गए, तस्वीरों में कैद।
    लेकिन हर तस्वीर पर, यादें हैं मुस्तैद।

 

__________________________

सुशीला शिवराण

गुड़गाँव

Email – sushilashivran@gmail.com

Total votes: 268