कोणार्क के जैसा है ग्वालियर का सूर्य मंदिर

14 जनवरी.

ग्वालियर। ग्वालियर में बना सूर्यमंदिर कोर्णाक के प्राचीन सूर्यमंदिर से काफी मिलता जुलता है। इस मंदिर की खासियत है कि यहां सूर्य की पहली किरण से अंतिम किरण मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्ति तक पहुंचती है।

देश के माने हुए उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला द्वारा बनाए गए इस मंदिर में हालांकि साल भर सैलानी और श्रद्धालुओं की आवाजाही लगी रहती है। लेकिन मकर संक्राति के दिन इस मंदिर में पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

लेकिन सूर्यमंदिर का नाम जब भी हम सुनते तो कोणार्क के प्राचीन सूर्यमंदिर का दृश्य सामने अक्सर उभर आता है। ग्वालियर में भी 530 ईस्वी के समय के सूर्योपासना की पूजा के अवशेष किले के ऊपर बने सूरज कुंड के पास 7 सूर्यमंदिर से भी मिलते हैं। इसी परंपरा को ध्यान में रखते हुए उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला ने कोणार्क में बनें सूर्यमंदिर की डिजाइन से ही प्रेरणा लेकर ग्वालियर में लगभग चार दशक पहले 1984 में विवस्वान (सूर्य) मंदिर बनवाया। जहां चार साल बाद 1988 में बसंत कुमार बिड़ला ने इस मंदिर का औपचारिक लोकार्पण किया।

सात घोड़ों व रथ पर सवार है सूर्य मंदिर

ग्वालियर में बने सूर्यमंदिर का डिजाइन भी कोणार्क की ही तरह उल्टे कमल की तरह मंदिर डोम पर बनाया गया है। इस मंदिर को भी सात घोड़ों के रथ पर सवार सूर्य के आकार में ही बनाया गया है। सूर्यमंदिर में भी भगवान सूर्य सप्ताह के दिनों के प्रतीक सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। साल के 12 महीनों के प्रतीक के तौर पर रथ में 12-12 (कृष्ण पक्ष-शुक्ल पक्ष के प्रतीक) पहिए दोनों ओर लगाए गए हैं। जिसमें प्रत्येक पहिए में आठ बड़े और आठ छोटे आरे हैं, जो दिन और रात समय के 8 प्रहरों के प्रतीक हैं। भगवान सूर्य की प्रतिमा भी गर्भगृह में है। यहां खिड़कियां बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि सूर्य की पहली किरण से अंतिम किरण तक भगवान सूर्य की प्रतिमा को रोशन रख सके ।

सुबह शाम होती है आरती

शहर की प्राचीन सूर्योपासना की परम्परा का पालन करते हुए मंदिर में ठीक सूर्योदय और सूर्यास्त के दाेनों समय आरती की जाती है। ढोल नगाड़ों की ताल पर मंदिर में श्रद्धालु और पुजारी आदित्य-हृदय स्तोत्र का पाठ और सूर्य आरती का गायन मंत्रमुग्ध होकर करते हैं। मंदिर के वास्तु के कारण नगाड़ों और गायन के स्वर मिल कर मंदिर में आध्यात्मिक वातावरण बना देते हैं।

ये है मंदिर की विशेषताएं

मंदिर ऊंचाई-76 फीट 1 इंच

गर्भगृह में मुख्य मूर्ति की ऊंचाई-13 फीट 2 इंच

मंदिर के बाहर लाल पत्थर से बनी मूर्तियां-373

कुल पत्थरों का प्रयोग जो मंदिर में प्रयोग किया गया -42,500 घनफीट लाल व 33,000 घनफीट फरसी

मंदिर परिसर में लगा संगमरमर-9940 वर्गफुट

शिल्प शास्त्री-चंद्रकांत बलवंत राव सोमपुरा

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