दो युवा क्रांतिकारी भाइयों ने छकाया पुलिस को

स्वतंत्रता संग्राम और ग्वालियर-5

राहुल आदित्य राय
13  अगस्त
ग्वालियर। वतन की आजादी की ललक लिए फिरंगियों से भिड़ रहे युवाओं में असीम जोश था। कठोर यातनाओं के बाद भी वे अपने संकल्प पर दृढ़ थे। ग्वालियर में ऐसे ही दो युवा क्रांतिकारियों ने पुलिस को जमकर छकाया। पुलिस उनसे हथियारों के बक्से का सुराग लेना चाहती थी। यह युवा क्रांतिकारी थे बीस वर्षीय बालकृष्ण शर्मा और उनके छोटे भाई बालमुकुन्द शर्मा।

ये दोनों 1932 में ग्वालियर गोवा कांसप्रेसी केस में आरोपी थे। इन्हें यहां ब्रिगेड थाना कम्पू (अब कमलाराजा हॉस्पिटल) में रखा गया था। ग्वालियर पुलिस को दिल्ली पुलिस से सूचना मिली कि इनके पास हथियारों का एक काला बक्सा है, जिसे इन्होंने कहीं छुपा रखा है। बालमुकुन्द शर्मा से जब पुलिस पूछती तो वह रटारटाया जवाब देते, मुझे कुछ नहीं मालूम, लेकिन उनके बड़े भाई बालकृष्ण शर्मा ने पुलिस की हवा खराब कर रखी थी। सिपाही जब कहते कि बक्सा कहां है, बता दो नहीं तो तुम्हारी हड्डीु पसली तोड़ देंगे, तो वह बड़ी हिम्मत से जवाब देते, देखो हमें परेशान मत करो, नहीं तो हम भी तुम्हारी हालत खराब कर देंगे। यह सुनकर सिपाही चकरा जाते कि दो छोटे बच्चे जो उनकी कैद में हैं, उन्हें परेशान भी कर सकते हैं।

सिपाही एक जमादार को लाए जो यातनाएं देने में माहिर था, जिसका डर उन्हें कई दिन से दिखाया जा रहा था, उसने आकर कहा कि बक्सा बता दो नहीं तो तुम्हारा कचूमर निकाल देंगे। इस पर युवक बालकृष्ण ने जवाब दिया, अगर कचूमर निकालने से बक्सा मिल जाए जो जल्दी निकाल दो। जमादार ने पूछा-फिर किसे दे दिया बक्सा। उन्होंने कहा-बावड़ी में पटक दिया।

यह सुनकर जमादार बहुत खुश हुआ, वह समझा कि उसने कामयाबी हासिल कर ली है। पूछा-कौन सी बावड़ी में। इस पर वहीं खड़े एक सिपाही ने कह दिया, वही इनके घर के पास शिन्दे की छावनी वाली बावड़ी होगी।

तीसरे दिन पुलिस इन्हें कोठरी से निकाल कर शिन्दे की छावनी ले गई। दो गोताखोर बावड़ी में कूद गए और दो घंटे तक बक्से की खोजबीन करते रहे। पूरी बावड़ी को खंगाल डाला। कई पुरानी चीजें निकलीं, लेकिन बक्सा नहीं मिला। जमादार ने उनसे कहा-बेटा क्यों परेशान कर रहे हो, बता दो कहां पटका बक्सा। उन्होंने कहा-पटका हो तो बताऊं। सुनकर जमादार का पसीना छूट गया।

उन्हें फिर हवालात में बंद कर दिया गया। सात दिन बाद एक हवलदार ने फिर बक्से के बारे में छेड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने फिर पुलिस को परेशान करने के लिए कह दिया, आमखो में एक पेड़ के नीचे गाड़ दिया है, लेकिन हवलदार समझ गया। वह बोला-बेवकूफ मत बनाओ, अगर वहां कुछ नहीं मिला तो तुम्हें वहीं गाड़ दूंगा। उन्होंने कहा-आप सही नतीजे पर पहुंचे हैं।
जब बक्से का कुछ पता ही नहीं है तो क्यों परेशान कर रहे हो। उस दिन से पूछताछ बंद हो गई।

लेकिन रात में एक हवलदार पंडित जी जाग रहे हो की सो रहे हो, कहकर जगाने लगा। उसके बाद सभी सिपाही उन्हें पंडित जी कहने लगे। पता चला कि जो पुलिस को छका देता है वह पुलिस की नजरों में सम्मान पा जाता है। उसके बाद दोनों भाइयों को छत्री बाजार स्थित टकसाल की हवालात भेज दिया गया।

 

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किस्त #1. भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे ग्वालियर के युवा

किस्त #2. नेताओं की तस्वीर रखने पर गिरफ्तारी

किस्त #3. गोवा से हथियार लाते थे क्रांतिकारी

किस्त #4. 'ग्वालियर-गोवा-बम्बई षडयंत्र केस' में कड़ी यातनाएं दी गईं क्रांतिकारियों को

किस्त #6. सिर कटाना मंजूर टोपी उतारना नहीं

किस्त #7. चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह आते थे ग्वालियर, काकोरी गए थे यहां से बम

 

कल छठवीं किस्त में पढ़िए-सिर कटाना मंजूर, टोपी उतारना नहीं

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