सिर कटाना मंजूर टोपी उतारना नहीं

राहुल आदित्य राय

14  अगस्त

ग्वालियर। बरतानिया हुकूमत ने तमाम पाबंदियां लगा रखी थीं। कड़ी सजाएं और यातनाएं दी जा रही थीं। लेकिन आजादी के मतवाले नौजवानों के हौसले उरूज पर थे। सिर कटाना मंजूर था, लेकिन झुकाना नहीं।

स्वदेशी के प्रचार, खादी पहनने, सभा करने, संस्था बनाने और भाषण देने तक पर पाबंदी थी। लेकिन फिर भी आजादी के लिए संघर्ष कर रहे युवा इन पाबंदियों की परवाह किए बिना अपनी गतिविधियां चला रहे थे।

खादी की टोपी पहनने पर भी रोक थी, लेकिन श्री सिरमल दूगड़ खादी की टोपी उतारने को तैयार नहीं थे। जब उन्हें टोपी पहनने से रोका गया तो उन्होंने दो टूक कह दिया ‘सिर कटा सकता हूं, लेकिन सिर से टोपी नहीं उतर सकती’। इस दुस्साहस पर उन्हें पहले जेल में डाल दिया गया और फिर ग्वालियर राज्य से निर्वासित कर दिया गया।

भाषण देने पर कैद-

नागरिक स्वतंत्रता के लिए 1939 में सेन्ट्रल कमेटी का लश्कर अधिवेशन हुआ। अधिवेशन में बड़े जोशीले भाषण दिए गए। तय किया गया कि अहिंसात्मक तरीके से सरकार पर पूरा जोर डाला जाए।

श्री श्यामलाल पाण्डवीय ने अपने जोशीले भाषण में मांग की कि 6 माह का अल्टीमेटम सरकार को देकर सार्वजनिक सभा की ओर से सविनय अवज्ञा आंदोलन किया जाये। लेकिन बहुमत न मिलने से यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका। किन्तु पाण्डवीय की भाषण से सरकार में चिंता दौड़ गई। उन्हें 23 नवंबर 1939 को बिना वारंट के गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चला और एक वर्ष कैद की सजा सुनाई गई। इसके बाद 5 अप्रैल 1940 को हरिसेवक मिश्र, 28अगस्त को मुरलीधर विश्वनाथ धुले को गिरफ्तार कर सजाएं दी गईं।

गांधी जी की जय बोलने पर आपत्ति-

स्वतंत्रता आंदोलन गांधी जी के प्रभाव में था। जहां कहीं भी कार्यक्रम होते गांधी जी की जय जयकार होती। 1939 में लश्कर कंपू के मैदान में अधिवेशन हुआ, जिसमें गांधी जी की जय बोलने पर प्रतिबंध था। लेकिन, जोश से भरे युवा विद्यार्थी कब झुकने वाले थे। अधिवेशन में मुख्य अतिथि पट्टााभि सीतारमैया जैसे ही अधिवेशन में पहुंचे पंडाल महात्मा गांधी जिन्दाबाद के नारों से गूंज उठा।

महिलाएं भी दे रहीं थी आहुति-

रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथाएं सुनकर जवान हुईं महिलाएं भी आजादी के यज्ञ में आहुति दे रहीं थीं। सभा करने, जुलूस निकालने के साथ क्रांतिकारियों के जोखिम भरे काम में भी महिलाओं की सहभागिता थी, लेकिन शिक्षा और जाग्रति के अभाव में महिलाओं की संख्या कम थी। ग्वालियर में रामेश्वरी देवी, कांतिदेवी और हंसमुख देवी का योगदान अविस्मरणीय है। किरण बिहारी दिनेश बाहर से कट्टे लाकर क्रांतिकारियों को देते थे। इन कट्टों को संभालकर रखने और निर्धारित स्थान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी रामेश्वरी देवी पर थी। वे बहुत साहस के साथ अपने काम को अंजाम देती थीं। कांतिदेवी आजादी के आंदोलन से महिलाओं को जोड़ने के लिए उन्हें जागरुक करती थीं। वे हर कार्यक्रम में शिरकत करती थीं। इसी तरह हंसमुख देवी भी महिलाओं को जागरुक करने में जुटी थीं।

 

स्वतंत्रता संग्राम और ग्वालियर अन्य किस्तें यहाँ पढ़ें -

किस्त #1. भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे ग्वालियर के युवा

किस्त #2. नेताओं की तस्वीर रखने पर गिरफ्तारी

किस्त #3. गोवा से हथियार लाते थे क्रांतिकारी

किस्त #4. 'ग्वालियर-गोवा-बम्बई षडयंत्र केस' में कड़ी यातनाएं दी गईं क्रांतिकारियों को

किस्त #5. दो युवा क्रांतिकारी भाइयों ने छकाया पुलिस को

किस्त #7. चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह आते थे ग्वालियर, काकोरी गए थे यहां से बम

 

कल सातवीं और अंतिम किस्त में पढ़िए- काकोरी गए थे ग्वालियर से बम

Total votes: 279