नेताओं की तस्वीर रखने पर गिरफ्तारी

10  अगस्त

स्वतंत्रता संग्राम और ग्वालियर-2

राहुल आदित्य राय

ग्वालियर। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में स्वदेशी आंदोलन जोर पकड़ रहा था। हर तरफ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जा रहा था। ग्वालियर में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी से आंदोलन इतना तीव्र हो गया कि सरकार घबरा गई। आंदोलन को कुचलने के लिए देशभक्त नेताओं की तस्वीर रखने और राष्ट्रभक्ति का तराना गाने पर भी गिरफ्तार कर यातनाएं दी गईं। इस दौरान ग्वालियर में पहला राजद्रोह का मुकदमा चला जो ‘ग्वालियर सिडीशन केस’ के नाम से चर्चित हुआ।

विद्यार्थी प्राणप्रण से स्वदेशी के प्रचार में जुट गए। स्वदेशी माल की दुकानें खुल गईं। कई जगह स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का संकल्प लिया गया। 1906 में स्वदेशी वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई गई, जिसमें लोगों द्वारा बढ़ चढ़कर की गई भागीदारी से सरकार की चिंताएं बढ़ गईं। सरकार की नजर में देश की जनता के महानायक शिवाजी, महाराणा प्रताप और आजादी के सिपाही लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं के चित्र रखना और वंदेमातरम् गाना भी अपराध हो गया। लश्कर तथा मुरार में चित्र रखने और बेचने पर सजाएं दी गईं। सरकार इस कदर सख्त हो गई कि साहित्य पढ़ने पर भी संदेह करने लगी। देशभक्तों को कुचलना शुरू कर दिया गया।

1906 में यहां राजद्रोह का पहला मुकदमा चला, जो ‘ग्वालियर सिडीशन केस’ के नाम से जाना गया। इसमें सैकड़ों लोग गिरफ्तार किए गए और बहुत सा साहित्य जब्त किया गया। जिस दिन इस केस में गिरफ्तारी हुई उस दिन, रात को इतना अधिक आतंक था कि लोगों ने अच्छी किताबें भी जला दीं और उनकी राख शौचालयों में बहा दी। इस केस में श्री माधवराव देसाई तथा उनके बड़े भाई और श्री हरिभाऊ रामचन्द्र दिवेकर सहित 40 विद्यार्थियों पर मुकदमा चला, जिन्हें भयंकर यातनाएं दी गईं।

पुलिस द्वारा की गईं गिरफ्तारियों और यातनाओं से लोग इतने अधिक भयभीत हो गए कि समाचार पत्र और साधारण किताबें पढ़नें में भी डर लगने लगा। संगठन बनाने और सभाएं करने पर भी सरकार ने रोक लगा दी थी।

समय गुजरने के साथ जब आतंक कम हुआ तो राष्ट्रीयता की हिलोर फिर जोर मारने लगी। 1913 में सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना की गई, जिसका मूल उद्देश्य हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना राष्ट्रीयता की विचारधारा को पोषित करना था। लोकमान्य तिलक द्वारा चलाए गए गणेशोत्सव अभियान को इस संस्था ने गति दी। 1902 में नागरी हितैषिणी सभा का गठन किया गया, जो 1908 में हिन्दी साहित्य सभा में तब्दील हो गई।

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