स्वदेशी का दोहन

30  सितम्बर

@ राजीव रंजन उपाध्याय

महात्मा गाँधी ने स्वदेशी के मर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि 'स्वदेशी की भावना का अर्थ है हमारी वह भावना, जो हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती परिवेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है ! उदाहरण के लिए, इस परिभाषा के अनुसार धर्म के संबंध में यह कहा जाएगा कि मुझे अपने पूर्वजों से प्राप्त धर्म का ही पालन करना चाहिए ! यदि मैं उसमें दोष पाऊँ तो मुझे उन दोषों को दूर करके उसकी सेवा करनी चाहिए ! इसी तरह राजनीति के क्षेत्र में मुझे स्थानीय संस्थायों का उपयोग करना चाहिए और उसके जाने-माने दोषों को दूर करके उनकी सेवा करनी चाहिए ! अर्थ के क्षेत्र में मुझे अपने पड़ोसियों द्वारा बनायी गई वस्तुयों का ही उपयोग करना चाहिए , और उन उद्योगों की कमियां दूर करके, उन्हें ज्यादा सम्पूर्ण और सक्षम बनाकर उनकी सेवा करनी चाहिए !

स्वदेशी की भावना की खोज करते हुए जब मैं देश की संस्थाओं पर नजर डालता हूँ -तो मुझे ग्राम-पंचायतें बहुत ज्यादा आकर्षित करती हैं ! भारत वस्तुतः प्रजातंत्र का उपासक देश है ! वह प्रजातंत्र का उपासक है इसीलिए वह उन सब चोटों को सह सका है , जो आजतक उस पर की गयी है ! राजाओं और नबाबों ने, वे भारतीय रहे हों या विदेशी, प्रजा से सिर्फ कर वसूल किया है, उसके सिवा प्रजा से उनका कोई संपर्क शायद ही रहा है ! और प्रजा ने राजा को उसका प्राप्य देकर अपना बाकी जीवन-व्यवहार अपनी इच्छा के अनुसार चलाया है ! वर्ग और जातियों का विशाल संघटन न केवल समाज की धार्मिक आवश्यकताएं पूरी करता था, बल्कि उनको राजनीतिक आवश्यकतायों की पूर्ति भी करता था ! गांव वाले अपना आंतरिक कामकाज जाति-संघटन के द्वारा चलाते थे और उसी के द्वारा वे राजकीय शक्ति के अत्याचारों का भी मुकाबला करते थे ! जाति-संघटन के द्वारा अपनी संघटन-शक्ति का ऐसा अच्छा परिचय जिस राष्ट्र ने दिया है, उसकी संघटन-शक्ति की क्षमता से इंकार नहीं किया जा सकता ! फिर भी यह कहने का प्रश्न हो गया है कि हम लोगों में संघटन की योग्यता नहीं है ! हाँ, यह बात उनके बारे में अमुक हद तक सही हो सकती है, जो नयी परम्पराओं में पले और बड़े हुए हैं !

स्वदेशी की भावना से हट जाने के कारण हमें भयंकर विघ्न-बाधाओं से गुजरना पड़ा है ! हम शिक्षित वर्ग के लोगों को हमारी शिक्षा विदेशी भाषा के माध्यम से मिली है, इसीलिए आम जनता को तनिक भी प्रभावित नहीं कर सके हैं ! हम जनता का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं, पर हम उसमें असफल सिद्ध होते हैं ! हमारी आकांक्षाएं हमारी नहीं हैं ! इसीलिए हमारा और उनका संबंध -सूत्र टूट सा गया है ! सच बात यह है कि प्रतिनिधियों में और प्रजा में आपस का नाता ही नहीं है! अगर पिछले पचास वर्षों में हमें अपनी ही भाषाओँ के माध्यम से शिक्षा मिली होती, तो हमारे बड़े-बूढ़े, घर के नॉकर और पडोसी सब हमारे उस ज्ञान में हिस्सा लेते ! बोस और राय जैसे वैज्ञानिको के अविष्कार रामायण और महाभारत की तरह हर घर में प्रवेश कर जाते ! अभी तो स्थिति ऐसी है कि जनता के लिए ये आविष्कार विदेशी वैज्ञानिकों द्वारा किये गए आविष्कारों जैसे ही हैं ! यदि विविध पाठ्य-विषयों की शिक्षा देशी भाषाओं द्वारा दी गई होतीं, तो मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि हमारी इन भाषाओँ की आश्चर्यजनक समृद्धि हुई होती ! गाँवों की स्वच्छता आदि के सवाल वर्षों पहले हल हो गए होते ! ग्राम पंचायतें जीवित शक्ति के रूप में काम कर रही होतीं, भारत को जैसा स्वराज चाहिए वैसा स्वराज वह भोगता होता और उसे अपनी पुनीत भूमि पर संगठित हत्या का अपमानकारी द्रश्य न देखना पड़ता ! खैर अभी भी अवसर है कि हम अपनी भूलें सुधार लें !

\\\" अब हम स्वदेशी भावना की आर्थिक शाखा पर विचार करें ! यहाँ भी जनता की अधिकांश गरीबी का कारण यह है कि आर्थिक और औद्योगिक जीवन में हमने स्वदेशी के नियम का भंग किया है ! अगर भारत में व्यापार की कोई भी वस्तु विदेशों से न लाई गयी होती, तो हमारी भूमि में दूध और मधु की नदियां बहती होतीं ! लेकिन यह तो होना नहीं था ! हमें लोभ था और इंग्लैंड को भी लोभ था ! इंग्लैंड और भारत का संबंध स्पष्टतया गलती पर कायम था ! मैं स्वदेशी को, बदला लेने के लिए चलाया गया बहिष्कार का आंदोलन नहीं मानता ! मैं उसे ऐसा धार्मिक सिंद्धांत मानता हूँ, जिसका पालन सब लोगों को करना चाहिए ! भारत अपने जीवन का उत्तम निर्वाह तभी कर सकता है, जब वह -- अपने प्रत्यत्न से या दूसरों की मदद लेकर --अपनी आवश्यकता की सारी वस्तुएं अपनी सीमा में उत्पन्न करने लगे ! उसे नाशकारी प्रतिस्पर्धा के उस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, जो आपसी लड़ाई-झगड़ों, ईर्ष्या और अन्य अनेक बुराइयों को जन्म देता है ! लेकिन उसके बड़े सेठों और करोड़पतियों को इस विश्वव्यापी प्रतिस्पर्धा में पड़ने से कौन रोकेगा ? कानून तो निश्चय ही ऐसा नहीं कर सकता ! लेकिन लोकमत का बल और समुचित शिक्षा अवश्य इस दिशा में बहुत कुछ कर सकती है ! अगर हम स्वदेशी के सिद्धांत का पालन करें तो हमारा और आपका यह कर्तव्य होगा कि हम उन बेरोजगारों पड़ोसियों को ढूंढें, जो हमारी आवश्यकता की वस्तुएं हमें दे सकते हों और यदि वे इन वस्तुओं को बनाना न जानते हों तो उन्हें उसकी प्रक्रिया सिखाएं ! ऐसा हो तो भारत का हर एक गांव लगभग स्वाश्रयी और स्वयंपूर्ण इकाई बन जाए ! दूसरे गाँवों के साथ वह उन चंद वस्तुओं का आदान-प्रदान जरूर करेगा, जिन्हें वह खुद अपनी सीमा में पैदा नहीं कर सकता ! भारत एक विचित्र देश है ! कोई दयालु मुसलमान शुद्ध पानी पिलाने के लिए तैयार हो, तो भी हजारों परम्परावादी हिन्दू ऐसे हैं प्यास से अपना गला सूखने देंगें लेकिन मुसलमान के हाथ का पानी नहीं पियेगें ! यह बात अर्थहीन तो है, लेकिन इस देश में यह होती है ! इसी तरह लोगों को एक बार इस बात का निश्चय करा दिया जाए कि धर्म के अनुसार उन्हें भारत में ही बने कपडे पहनने चाहिए और भारत में ही पैदा हुआ अन्न खाना चाहिए तो फिर वे कोई दूसरे कपडे पहनने या दूसरा अन्न खाने से इंकार कर देगें ! भगवद गीता का एक श्लोक है, जिसमें कहा गया है कि सामान्यजन श्रेष्ठ जनों का अनुकरण करते हैं ! स्वदेशी का व्रत लेने पर कुछ समय तक असुविधाएं तो भोगनी पड़ेंगीं, लेकिन उन असुविधाओं के बावजूद यदि समाज के विचारशील व्यक्ति स्वदेशी का व्रत अपना लें, तो हम उन अनेक बुराइयों का निवारण कर सकते हैं जिनसे हम पीड़ित हैं ! मैं कानून द्वारा किये जाने वाले हस्तक्षेप को, वह जीवन के किसी भी विभाग में क्यों न किया जाये, बिलकुल नापसंद करता हूँ ! उसके समर्थन में ज्यादा से ज्यादा यही कहा जा सकता है कि दूसरी बुराई की तुलना में वह कम बुरी है लेकिन अपनी इस नापसंदगी के बावजूद मैं विदेशी माल पर अगर सख्त आयात कर लगाना न सिर्फ सह लूंगा , बल्कि मैं चाहूंगा कि ऐसा किया जाए !

कहा जाता है कि भारत कम से कम आर्थिक जीवन में तो स्वदेशी के नियम आचरण नहीं कर सकता ! जो लोग यह दलील देते हैं वे स्वदेशी को जीवन के एक अनिवार्य सिद्धांत के रूप में नहीं मानते ! उनके लिए वह महज देश सेवा का कार्य है, जो अगर उसमें ज्यादा आत्म-संयम करना पड़ता है तो, छोड़ा भी जा सकता है ! लेकिन स्वदेशी एक धार्मिक नियम है जिसका पालन उससे होने वाले सारे शारीरिक कष्टों के बावजूद भी होना ही चाहिए ! स्वदेशी का व्रत लेने वाला ऐसी सैकड़ों चीजों के बिना ही अपना काम चलाना सीख लेगा, जिन्हें आज तक जरुरी समझता है ! जो लोग स्वदेशी को असंभव कहकर टाल देना चाहते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि स्वदेशी आखिर एक आदर्श है जिसे लगातार कोशिश करके क्रमशः प्राप्त करना है ! यदि फ़िलहाल हम यह नियम को अमुक वस्तुओं तक ही मर्यादित रखें और जो वस्तुएं देश में प्राप्य नहीं हैं, उनका उपयोग जारी रखें, तो भी हम आदर्श की दिशा में बढ़ते रह सकते हैं !

मुझे स्वदेशी के खिलाफ उठाये जाने वाले एक अन्य आक्षेप पर और विचार करना है ! आक्षेपकारों का कहना है कि वह एक अत्यंत स्वार्थपूर्ण सिद्धांत है और सभ्यजनों की मानी हुई नीति में उसे कोई स्थान नहीं हो सकता ! मैं यहाँ इस कथन का विस्तृत विश्लेषण नहीं कर सकता, किन्तु मैं यह कहूंगा कि नम्रता और प्रेम के नियमों के साथ एकमात्र स्वदेशी का ही मेल बैठ सकता है ! लेकिन जो लोग चरखे से जैसे-तैसे सूत कातकर खादी पहन-पहनाकर स्वदेशी धर्म का पूरा पालन हुआ मान लेते हैं, वे भी बड़े मोह में डूबे हुए हैं !खादी सामाजिक स्वदेशी की प्रथम सीढ़ी है, वह स्वदेशी-धर्म की आखिरी हद नहीं है ! ऐसे खादीधारी देखे गए हैं, जो और सब चीजें परदेशी खरीदते हैं, वे स्वदेशी-धर्म का पालन नहीं कर रहे, वे तो सिर्फ चालू बहाव में बह रहे हैं ! स्वदेशी व्रत का पालन करने वाला हमेशा अपने आसपास निरीक्षण करेगा और जहाँ-जहाँ पड़ोसियों की सेवा की जा सके, यानी जहाँ-जहाँ उनके हाथ का तैयार किया हुआ जरुरत का माल होगा , वहां दूसरा छोड़कर उसे लेगा फिर भले ही स्वदेशी चीज पहले-पहल महँगी और कम दर्जे की हो ! व्रतधारी उसको सुधारने की कोशिश करेगा ! स्वदेशी ख़राब है इसीलिए कायर बनकर वह परदेशी का इस्तेमाल करने नहीं लग जाएगा !

लेकिन स्वदेशी -धर्म जानने वाला अपने कुँए में डूबा नहीं रहेगा ! जो चीज स्वदेश में नहीं बनती हों या बड़ी तकलीफ से बन सकती हो, उसे परदेश के द्वेष के कारण अपने देश में बनाने लग जाये तो वह स्वदेशी धर्म नहीं है ! स्वदेशी -धर्म पालने वाला परदेशी का द्वेष कभी नहीं करेगा ! पूर्ण स्वदेशी में किसी का द्वेष नहीं है ! वह संकुचित धर्म नहीं है ! वह प्रेम में से ---अहिंसा में से -- निकला हुआ सुन्दर धर्म है' !

             बापू जानते थे स्वदेशी को जनमानस के जीवन का अंग बनाना आसान नहीं तभी उन्होंने धर्म पालन की तरह इसके निर्वहन का आव्हान किया ! स्वदेशी को व्रत की तरह पवित्र भावना से अंगीकार करने के लिए इसे स्वदेशी -व्रत की संज्ञा दी ! तभी करोड़ों देशवासियों ने दशकों तक पूरे मनोयोग से इसे अंगीकार किया ! महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आज स्वदेशी का विचार प्रासंगिक है ? इसकी जैसी आवश्यकता एक शताब्दी पूर्व थी, क्या उसी रूप में इसका पालन किया जा सकता है ! क्या समाज और काल-परिस्थितिओं में रिवर्स गियर लगाना संभव है ? यदि नहीं तो आज क्यों यह शब्द चलन में है और क्यों इस पर गिद्धदृष्टि है !

             आज इस शब्द पर और चर्चा आवश्यक है क्योंकि अब इस शब्द का इस्तेमाल निजी मुनाफे के लिए किया जा रहा है ! हम भारतीयों के डीएनए में कुछ अवधारणा स्थापित हैं ! कुछ शब्दों से जन्मजात लगाव है ! वे हमारी पहली पसंद बनते हैं ! जैसे अंग्रेजी दवाइयों के मुकाबले देसी दवाइयाँ अच्छी हैं ! क्यों ? तो जबाब होता है,ये फायदा नहीं करती तो नुकसान भी नहीं करतीं दूसरा इनका साइड इफ़ेक्ट नहीं होता ! सो हम डॉ के पास जाने से पहले हम इन नुस्खों की तरफ भागते हैं ! बिना इस पर विचार किये कि बीमारी किस स्टेज पर है, उसे किस पोटेंसी की दवा की आवश्यकता है ! जो देसी दवा खा रहे हैं, उसकी पोटेंसी क्या है ?कहीं ऐसा तो नहीं इस गफलत में हमारा कीमती समय निकल जाए ! हम जिन देसी दवाइयों पर विश्वास करते हैं, उनमें भी रोग में फायदे अनुसार कुछ कम-ज्यादा मात्रा में केमिकल्स मौजूद रहते हैं ! तभी वे सहायक होते हैं !अंग्रेजी दवाइयों में उसका ऑब्स्ट्रेट होता है, मात्रा के अनुसार ! कभी वे सीधी ले ली जातीं हैं, कभी लैब्रोटरी में बनती हैं ! अकसर उनमें कॉम्बिनेशन बना दिया जाता है, जो रोग पर शीघ्र और कारगर त्वरित असर कर सकें !

             ऐसी ही लगाव हमें स्वदेशी को लेकर है, स्वाधीनता आंदोलन से राष्ट्र प्रेम प्रतीक हैं !जिससे यह राष्ट्रप्रेम की सगुण अभिव्यक्ति बन जाती है ! गांधी के स्वदेशी का सीमित अर्थ सिर्फ 'मेड इन इंडिया' नहीं है ! गाँधी जी के अनुसार -'स्वदेशी की भावना का अर्थ है हमारी वह भावना, जो हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती परिवेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है '! यानि पहले पड़ोस, फिर गांव, फिर तहसील, फिर जिला ,फिर प्रदेश और बाद में देश ! दूसरा 'स्वदेशी के व्रत' में ईर्ष्या - द्वेष के लिए कोई स्थान नहीं ! न देश में हमारे उत्पाद के अन्य प्रतिद्वंदी उत्पादनकर्तायों के प्रति,वरन विदेशी उत्पादनकर्तायों के प्रति भी !

                         वर्तमान के स्वदेशी के पैरोकारों की नियत जानने के लिए, इनके विज्ञापन और कारोबार फ़ैलाने के तरीकों की पड़ताल करना आवश्यक है ! इनके विज्ञापनों को इन दोनों कसौटियों पर कसें तो पायेगें ये फरेब से भरे हैं तथा 'स्वदेशी के मर्म' के ठीक विरोधी हैं ! इनके विज्ञापन अपने सभी को प्रतिस्पर्धियों को मिलावटखोर ठहरा कर अपने उत्पाद को श्रेष्ठ साबित कर ग्राहकों में भ्रम फ़ैलाने की चेष्ठा लगेगी ! इसका सीधा मतलब उनके कारोबार को नष्ट कर अपने कारोबारी साम्राज्य को मजबूत करना है ! कोई स्वदेशी का समर्थक ऐसी कुचेष्टा नहीं कर सकता किन्तु ये कर रहे हैं ! यह अभियान तब और अधिक मारक तब बन जाता है, जब कोई भगवाधारी इसका मुख़ौटा बनता है ! भगवा धारण करने के समाज में कुछ सन्देश हैं ! इससे हमारी परंपरागत धारणाऐं जुडी हैं ! सामान्यजन इनसे झूठ-छल-कपट-धूर्तता-स्वार्थपूर्ण व्यवहार की आशा नहीं करता ! कथन को सामान्यतः सच समझ स्वीकार किया जाता है ! इनकी मुनाफाखोरी को भी समझना जरुरी है ! ग्वारपाठे का उपयोग सामान्यजन सदियों से चोट के उपचार में कर रहा है ! आयुर्वेदिक कंपनियां उत्पादकों से इसे पांच से सात रु किलो की दर से खरीदते हैं ! वही ओलिवेरा के नाम से अनमोल बन जाता है ! उसका जूस सैकड़ों रु किलो के भाव बिकने लगता है ! साबुन एवम अन्य चीजों में मिलकर दिव्य हो जाता है ! यही हाल आंवले का है ! हमने सुना नहीं कि अपने मुनाफे से कुछ राशि जनकल्याण में खर्च करते हों , हाँ ये जरूर सुना कि कल तक का फटीचर आज हजारों करोड़ का मालिक बन गया है ! इससे कारोबार के मुनाफे, उनकी नियत और सेठियों की मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है ! जनकल्याण और देश प्रेम के नाम पर यह कारोबार खूब फल-फूल रहा है ! हमारी राष्ट्रभक्ति की भावना हिलोरें मारती हैं और हम टूल बन कर रह जाते हैं !

             इनके गेंहू के आटे में फायबर है तो क्या किसी अन्य आटा उत्पादक के आटे में नहीं है ? जबकि दोनों देश में उत्पन्न गेंहूँ से आटा बना रहे हैं ! इनका दलिया दिव्य कैसे हो जाता है और किसी छोटे उत्पादक का सामान्य कैसे रह जाता है ? जिस ऋषि के नाम पर सौंदर्य सामग्री बेचते हैं,उनका इन वस्तुयों से क्या वास्ता ? इनकी निर्मित चीजें देश के अन्य समान उत्पादनकर्तायों की तुलना में अनोखी कैसे हुईं ? इनके बिस्कुट खरीदने की अपेक्षा, स्थानीय बेकरी के बने बिस्कुट खरीदना स्वदेशी की भावना के ज्यादा निकट नहीं होगा ? यदि में पंसारी से लेकर मेंथी खाऊं, तो क्या किसी दिव्य पुड़िया बंद मेंथी से कम काम करेगी ? लेकिन भ्रम के मायाजाल बुने जा रहे हैं, एक की देखा-देखी अन्य कथित संत अपनी फॉलोइंग का पूरा दोहन करने कारोबार में उतरने को प्रेरित हुए हैं, कुछ आने के मार्ग पर हैं !

                         कारोबार फ़ैलाने के तरीके पर गौर करें तो पायेगें उत्पादन - विज्ञापन से पूर्व अपनी पकड़ फ़ैलाने के लिए कथित योग का इस्तेमाल किया गया ! जबकि वहां की क्रियाओं को देख कर आप उसे महज एक्सरसाइस कह सकते हैं ! योग है अंदर की यात्रा ! खुद से साक्षात्कार फिर ब्रह्म से एकाकार ! जब योग कराने वाला पूरे समय बकरबकर करेगा तो क्या ख़ाक खुद आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में पहुंचेगा, क्या अन्य को पहुंचने देगा ! वहां भी स्टेज पर आत्म प्रशंसा और परनिंदा ! अपने उत्पाद का प्रचार ! ये हमारी मान्यतायों/ आस्थायों /धारणाओं का कुशलता से शोषण है ! इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझना और उजागर करना जरुरी है !

             यदि आप स्वदेशी के माध्यम से देश को मजबूत करना चाहते हैं तो इन घेरों से आपको निकलना पड़ेगा ! स्थानीय उत्पादनकर्ताओं के हाथ मजबूत करने पड़ेगें ! विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था पर यकीन करना पड़ेगा ! किसी अरबपति को और धनवान बनाने में सहायक बनने से खुद को रोकना होगा ! याद रखें बापू ने कहा था - '' स्वदेशी व्रत का पालन करने वाला हमेशा अपने आसपास निरीक्षण करेगा और जहाँ-जहाँ पड़ोसियों की सेवा की जा सके, यानी जहाँ-जहाँ उनके हाथ का तैयार किया हुआ जरुरत का माल होगा , वहां दूसरा छोड़कर उसे लेगा फिर भले ही स्वदेशी चीज पहले-पहल महँगी और कम दर्जे की हो ! व्रतधारी उसको सुधारने की कोशिश करेगा ! स्वदेशी ख़राब है इसीलिए कायर बनकर वह परदेशी का इस्तेमाल करने नहीं लग जाएगा !

             लेकिन स्वदेशी -धर्म जानने वाला अपने कुँए में डूबा नहीं रहेगा ! जो चीज स्वदेश में नहीं बनती हों या बड़ी तकलीफ से बन सकती हो, उसे परदेश के द्वेष के कारण अपने देश में बनाने लग जाये तो वह स्वदेशी धर्म नहीं है! स्वदेशी -धर्म पालने वाला परदेशी का द्वेष कभी नहीं करेगा ! पूर्ण स्वदेशी में किसी का द्वेष नहीं है ! वह संकुचित धर्म नहीं है ! वह प्रेम में से ---अहिंसा में से -- निकला हुआ सुन्दर धर्म है''!

You voted 4. Total votes: 243