हर पिता को ऐसा होना चाहिए

05  सितम्बर

@ बिक्रम कुमार सिंह

कहते हैं कि समाज नहीं, बल्कि एक पिता ही हैं, जिसके कारण बेटियां अपने सपने को साकार करती है। पिता का विश्वास और आस ही बेटियों को उसकी मंज़िल तक पहुंचाती है। यूं तो देश में काफ़ी बेटियों ने देश का नाम रौशन किया है। इस बार भी रियो ओलंपिक में बेटियों ने ही देश का मान रखा है, बेटियों के इस सफ़लता में देशवासियों के साथ-साथ एक पिता का भी सीना चौड़ा हो जाता है। आइए, हम आपको एक ऐसे पिता की कहानी बताते हैं, जो पूरे देश के लिए सुपरस्टार से कम नहीं हैं।

गुरु द्रौण से सम्मानित हरियाणा के महाबीर फौगाट देश के लिए 44 इंटरनेशनल पदक जीत चुके हैं, इस बार 29 अगस्त राष्ट्रपति उन्हें सम्मानित भी करेंगे। देश के लिए मेडल जीतने के बाद वे रुके नहीं, बल्कि अपनी पांचों बेटियों को कुश्ती की ट्रैनिंग देकर आगे बढ़ते रहे।

एक ओर हरियाणा में लड़कियों की लिंगानुपात में काफ़ी कमी देखने को मिल रही है, वहीं महाबीर फौगाट जैसे लोग देश के लिए मिसाल बन रहे हैं, महाबीर फौगाट की तीनों बेटियां ओलंपियन और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित खिलाड़ी हैं, यह उपलब्धि एक दिन की नहीं है. इसके पीछे दिन-रात की मेहनत है।

बड़ी बेटी गीता को 11 साल की उम्र में ही महाबीर फौगाट ने कुश्ती की ट्रेनिंग देना शुरू किया था, ट्रेनिंग का असर 2003 के एशियन जूनियर कैडेट्स चैंपियनशिप में दिखने लगा, इस प्रतियोगिता में गीता ने गोल्ड हासिल किया।

गीता भी बहनों को कुश्ती सिखाती है

गीता अब देश की जान बन चुकी हैं, इन सब के बावजूद वे ख़ुद प्रैक्टिस करती है और अपनी चारों बहनों को भी सिखाती है।

महाबीर फौगाट की पांचों बेटियों ने नेशनल में 41 और इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में 44 मेडल हासिल किए हैं, जो किसी उपलब्धि से कम नहीं है.

पत्नी का भी अहम योगदान है

महाबीर फौगाट ने एक सपना देखा था, जो धीरे-धीरे साकार हो रहा है।

बेटियों को खेल जगत में इस ऊंचाई तक पहुंचाने में उनकी पत्नी दयाकौर का भी बड़ा योगदान है, बेटियों की प्रैक्टिस में कोई रुकावट ना हो इसके लिए उन्होंने गांव की सरपंची छोड़ दी थी, वे बेटियों के खान-पान पर विशेष ध्यान रखती हैं।

हमें गर्व है कि महाबीर फौगाट हमारे देश के उस क्षेत्र से आते हैं, जहां लड़कियों को कुछ नहीं समझा जाता है, यदि महाबीर फौगाट जैसे पिता सभी जगह हो, तो देश में बेटियों की कमी नहीं होगी।

 

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