नगालैण्ड: नगाओं की आँखों में अलग देश का सपना

24 जून

@ डॉ राकेश पाठक

प्रधान संपादक, डेटलाइन इंडिया

नगालैण्ड यानि भारत का पूर्वी द्वार। एशिया के इतिहास के सबसे लंबे अलगाववादी आंदोलन की धरती। एक ऐसा प्रदेश जिसे फिरंगी भी कभी पूरी तरह अपने कब्ज़े में नहीं कर पाये। एक अलग देश होने के सपने को सदियों से पालने पोसने वाले लोग कभी भी पूरे मन से भारत से रिश्ता नहीं बना पाये।

नगा विद्रोहियों से कथित समझौते के कारण नगालैण्ड एक बार फिर जेरे बहस है। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर समस्या है क्या...!

हमारे पूर्वोत्तर में असम का 'नगा हिल्स' उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अंग्रेजों के कब्ज़े में आया। इसके प्रतिरोध में सन् 1918 में नगा क्लब बना। जब सन् 1929 में सायमन कमीशन को 'नगा क्लब' ने चिठ्ठी लिख कर साफ कह दिया कि 'आदि काल से हम स्वतंत्र राष्ट्र हैं, हमें अकेला छोड़ दो' तब अंग्रेज भी हैरान रह गए थे।

दरअसल नगा लोग सदियों से अपने देश 'नगालिम' का सपना देख रहे हैं। इसमें असम, अरुणाचल, मिजोरम और म्यांमार के भी कुछ हिस्से शामिल होंगे। इसके लिए नगा क्लब और बाद में 1946 में गठित NNC यानि 'नगा नेशनल काउंसिल' ने लोगों को लामबंद किया।

!! भारत की आज़ादी से एक दिन पहले आज़ाद

देश की आज़ादी से एक दिन पहले 14 अगस्त 1947 को नगाओं ने खुद को आज़ाद देश घोषित कर दिया था। इससे पहले यह क्षेत्र असम का एक जिला 'हिल डिस्ट्रिक्ट' कहलाता था। सन् 1951 में NNC ने जनमत संग्रह कराया जिसमें 99 प्रतिशत लोगों ने स्वतंत्र नगालैण्ड का समर्थन किया।

तब अंगामी जापु फिज़ो नगाओं के नेता थे। पं नेहरू ने इस नगा स्वतंत्रता को मान्यता नहीं दी और उन्हीं के प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र में भी इसे मान्यता नहीं मिली।

फिज़ो ने सन् 52 में अपनी भूमिगत सरकार और फेडरल आर्मी बना कर सशस्त्र विद्रोह कर दिया। भारत सरकार ने इससे निपटने को सेना भेजी और आर्म फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट लागू कर दिया। NNC के आव्हान पर देश के पहले आम चुनाव (सन् 52) का नगालैण्ड में पूर्ण बहिष्कार हुआ।

फिज़ो ने पूर्वी पाकिस्तान में शरण ले ली। बाद में फिज़ो लन्दन चले गए, जहाँ उनकी 1960 में फेफड़ों के कैंसर से मौत हो गयी।

!! NSCN का उदय

सन् 1975 में सरकार का NNC से 'शिलांग समझौता' हुआ लेकिन थुइगलोंग मुइवा गुट ने इसे मंज़ूर नहीं किया। इसाक चिसि और खपलांग भी मुइवा के साथ आ गए तब 'नेशनल सोशलिस्ट काउन्सिल ऑफ़ नगालिम' का गठन हुआ। इसी NSCN को पूर्वोत्तर में 'समस्त अलगाववाद की जननी' (mother of all insurgensies) कहा जाता है। इस संगठन से अलग होकर खपलांग गुट ने नया संगठन बनाया लेकिन असल ताकत इसाक मुइवा गुट के पास ही रही।

दशकों लंबे इस सशस्त्र संघर्ष में हज़ारों लोग मारे गए हैं लेकिन नगाओं का संघर्ष थका नहीं है।

!! कई प्रधानमंत्रियों से सीधे वार्ता

अगर आप नगा विद्रोहियों को साधारण आतंकवादी समझ रहे हैं तो भूल कर रहे हैं। ये नक्सलियों की तरह जंगल में रह कर सिर्फ गुरिल्ला युद्ध लड़ने वाले ही नहीं हैं। NSCN(IM) के दुनिया के तमाम देशों में दफ्तर हैं।

इनकी हैसियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव और अटल बिहारी बाजपेयी ने इसके नेताओं से पेरिस में मुलाकात की। प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ज्यूरिख में मिले। अटल और आडवाणी दुबारा दिल्ली में मिले। मनमोहन सिंह, राजेश पायलट भी इसाक मुइवा से ऐलानिया मिलने वालों में शामिल हैं।

और अब वे दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास पर आमने सामने बात करके गए हैं।

सन् 1964 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बी पी चालिहा और ईसाई पादरी रेवरेंड माइकल स्कॉट के साथ शांति मिशन पर नगालैण्ड गए थे।

इन शांति वार्ताओं में युद्ध विराम पर सहमति होती रही और भंग भी हुयी। नगाओं का अनथक संघर्ष जारी है।

नगाओं के अलग देश के सपने को चकनाचूर करना बहुत आसान नहीं है।

भारत सरकार के साथ हुआ समझौता पूरी तरह सामने आने पर ही साफ़ होगा कि नगाओं की आकांक्षाओं को इसमें कितना और किस तरह संजोया गया है। उम्मीद करना चाहिए कि नगा और नगालैण्ड राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल होंगे।

निसंदेह नरेंद्र मोदी की सरकार अगर इस मुद्दे पर सधे हुए कदम बढ़ा रही है तो देश को उसका समर्थन करना चाहिए।

 

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