अभावों से जूझते रहे झंडागान के रचयिता

09  अगस्त

पुण्य तिथि 10 अगस्त पर विशेष

@ ज्ञानेन्द्र रावत

देश की आजादी के आंदोलन के दौरान क्रांतिवीरों में गीतों के माध्यम से अभूतपूर्व जोश भरने वाले अनूठे व्यक्तित्व का नाम है श्यामलाल गुप्त ‘‘पार्षद’’। श्री गुप्तजी का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के नरबल कस्बे के एक साधारण व्यवसायी श्री विश्वेसर गुप्त के यहां 16 सितम्बर 1893 को हुआ था। पांच भाइयों में श्री गुप्त सबसे छोटे थे। इनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, फिर भी मिडिल की परीक्षा इन्होंने जैसे-जैसे पास की और उसके बाद विशारद की उपाधि भी हासिल की। इसके बाद आपने जिला परिषद और नगर पालिका में अध्यापक की नौकरी भी की, लेकिन दोनों जगह पर तीन साल का बाँड भरने की नौबत आने पर श्री गुप्त ने तुरंत नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। वह 1921 में श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के सम्पर्क में आए और उसके बाद तो उन्होंने फतेहपुर को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। एक प्रतिनिधि की हैसियत से उन्होंने नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में भी भाग लिया और सबसे पहले फतेहपुर में वह रानी असोधर के महल से असहयोग आंदोलन शुरू करने के आरोप में 21 अगस्त 1921 को गिरफ्तार हुए और जेल गए। सन् 1924 में एक व्यंग रचना लिखने के अपराध में उनपर 500 रूपये का जुर्माना किया गया। 1930 में वह नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए और जेल गए। 1932, 1942 और 1944 में तो श्री गुप्त लम्बे समय तक भूमिगत रहे। इस बीच आपकी राजर्षि पुरूषोत्तमदास टंडन से भी मुलाकात हुई और जेलयात्रा के अपने साढ़े छह साल के दौरान मलाका जेल, इलाहाबाद में श्री मोतीलाल नेहरू, आगरा में श्री महादेव देसाई व पंडित रामनरेश त्रिपाठी जी से आपकी मुलाकात हुई जो घनिष्ठ मित्रता में बदल गई। जेल यात्रा के दौरान हर रविवार को जेल में होने वाली काव्यगोष्ठी में श्री गुप्त जी की महत्वपूर्ण भूमिका रहा करती थी। आप जिला कांग्रेस कमेटी फतेहपुर के आठ साल तक और जिला परिषद कानपुर के लगातार 13 साल तक अध्यक्ष रहे। काव्य के प्रति उनका लगाव बचपन से ही था। उन पर रामायण का काफी प्रभाव पड़ा और जब वह मात्र 15 साल के ही थे, उन्होंने बालकंाड की रचना कर डाली थी। लेकिन उस रचना को उनके पिता ने कुएं में फिकवा दिया, क्यांेकि उनका मानना था कि कविता लिखने वाला गरीब और फटेहाल रहता है, वह कोढ़ी हो जाता है। गुप्त जी द्वारा रचित बालकांड का यह पद देखिए: ‘‘चाहों कृपालु यही तुमसों, मति मेरी सुभक्ति ही मांहि सनी रहे। सोबत जागत ही निशिवासर, मो मति धर्म ही मांहि बनी रहे।।’’


1924 में जब स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था तब आपने विश्व विख्यात झंडागान की रचना की। इसको कांग्रेस ने स्वीकारा और 1925 में कानपुर कांग्रेस में यह गीत ध्वजारोहण के दौरान देश में पहली बार सामूहिक रूप से गाया गया। उस समय से यह गीत आजादी मिलने तक कांग्रेस के सभा, सम्मेलन, अधिवेशन और आंदोलन के समय बराबर गया जाता रहा। इस गीत ने देश के जन मानस में चेतना जागृत करने का महान और महत्वपूर्ण कार्य किया जिसको कर पाने में आजादी की लड़ाई के दौरान का नेतृत्व भी नाकाम रहा। श्री गुप्त जी द्वारा लिखित झंडागान इस प्रकार है:-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा          
झंडा ऊंचा रहे हमारा।            
सदा शक्ति बरसाने वाला          
वीरों को हरषाने वाला                   
शांतिसुधा सरसाने वाला                  
मातृभूमि का तन-मन सारा।                    
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (1)
              
लाल रंग भारत जननी का         
हरा अहले इस्लाम वली का       
श्वेत सभी धर्माें की ठीका          
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा                
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (2)           

है चरखे का चित्र संवारा          
माना चक्र सुदर्शन प्यारा          
हरे देश का संकट सारा          
है यह सच्चा भाव हमारा          
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (3)

इस झंडे के नीचे निर्भय
होवे महाशक्ति का संचय
बोलो भारत माता की जय
सबल राष्ट्र है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (4)

आओ प्यारे वीरो आओ
राष्ट्रध्वजा पर बलि-बलि जाओ
एकसाथ सब मिलकर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (5)

शान न इसकी जाने पाये
चाहे जान भले ही जाये
विश्व विजय करके दिखलाये
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (6)

उपरोक्त गीत में गांधीजी ने पहले खंड की तीसरी पंक्ति मंे ‘‘शांति’’ के स्थान पर ‘‘प्रेम’’ शब्द जोड़ा और गीत के दूसरे और तीसरे खंड को छोड़कर पूरा गीत स्वीकार कर लिया। यह गीत झंडागान के रूप में जाना गया। गांधीजी की मंजूरी के बाद इस गीत को देशवासियों ने स्वीकारा और हालत यह हो गई कि आजादी की लड़ाई के दौरान बच्चा, बूढ़ा और जवान सभी का यह प्रिय गीत बन गया। यही गीत श्री गुप्त की बरतानिया हुकूमत की आंख की किरकिरी बनने का कारण बना। परिणाम यह हुआ कि श्री गुप्त पर बरतानिया हुकूमत के खुफिया विभाग की हर समय नजर रहने लगी। इस सबके बाद श्री गुप्त अपने गीतों के माध्यम से 23 साल तक लगातार जन-साधारण में चेतना जागृत करते रहे। त्रिपुरा कांगे्रस के समय लगभग एक लाख कांगे्रस प्रतिनिधियों व नेताओं के साथ यह गीत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गाया था। आजादी मिलने के बाद इस गीत को एक तरह से भुला दिया गया। देश के लिए उनके दिल में कितनी टीस थी, दर्द था, यह उनके इस गीत से प्रकट होता है। यह गीत श्री गुप्तजी ने 12 मार्च 1972 को लखनऊ स्थित कात्यायनी कार्यालय में सुनाया था।
    
‘‘देश गतिविधि देश की मैं मौन मन में रो रहा हूं,
आज चिन्तित हो रहा हूं।
बोलना जिनको न आता था, वही अब बोलते हैं,
रस नहीं वह देश के, उत्थान में विष घोलते हैं।
सर्वदा गीदड़ रहे, अब सिंह बन कर डोलते हैं,
कालिमा अपनी छिपाये, दूसरों की खोलते हैं।
देखकर उनका व्यतिक्रम, आज साहस खो रहा हूं,
आज चिन्तित हो रहा हूं।
’’
    
समाज के गरीब बच्चों की शिक्षा की खातिर आपने कानपुर में गंगादीन-गौरीशकंर विद्यालय की स्थापना की जो अब दोसर वैश्य इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है। इस कालेज की पत्रिका का भी आपने कई सालों तक संपादन किया। बाद में श्री गुप्तजी ने एक अनाथालय और एक बालिका विद्यालय की भी स्थापना की। वैश्य समाज में व्याप्त कुरीतियों यथा-दहेज प्रथा, फिजूलखर्ची आदि को खत्म करने और विधवाओं के पुर्नविवाह कराने हेतु आप जीवन भर संघर्षरत रहे।


श्री गुप्त जी इतने स्वाभिमानी थे कि जीवन भर अभावों में रहने के बावजूद भी उन्होंने किसी से याचना नहीं की। यहां तक कि वह अपने अभावांे का किसी दूसरे के सामने जिक्र तक करना मुनासिब नहीं समझते थे। एक दिन विद्यार्थी जी द्वारा नरबल में खोले गए आश्रम में जाते हुए उनके पैरों में कांच घुस गया। इसके कारण उनका पांव पक गया। अंत में उनको कानपुर के उर्सला हाॅर्समैन अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वहां उनके पैर का आॅपरेशन भी किया गया लेकिन उनका स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरता ही चला गया। वह जब मरणासन्न अवस्था में थे, तब कानपुर से प्रकाशित दैनिक आज के नगर संस्करण में श्री गुप्तजी की आर्थिक सहायता किये जाने का अनुरोध किया गया था। उस अपील का जब तक नगर के बुद्धिजीवियों, सम्पन्न लोगों और गुप्तजी के प्रशंसकों-प्रेमियों-समर्थकों पर कुछ असर होता, तब 10 अगस्त 1977 की रात के साढ़े आठ बजे ध्वजगान का रचयिता और राष्ट्र का महान सपूत 84 साल की उम्र में यातना को न सह सका और हमें सदा-सदा के लिए अकेला छोड़कर चला गया।


विडम्बना तो यह है कि जिस व्यक्ति ने 23 साल तक लगातार जिस झंडे को सदा उठाये रखा, राष्ट्र के ऐसे महानसपूत की याद में न तो एक भी दिन झंडा झुकाया गया और न उनके अंतिम संस्कार में राज्य सरकार के किसी भी मंत्री ने भाग लिया। हां इतना अवश्य हुआ कि जिले के सभी राजनैतिक दलों व अधिकारियों ने उनकी अंत्येष्ठि क्रिया पूरे राजकीय सम्मान से अवश्य की। यहां इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जिस व्यक्ति के लिखे गीत भीड़ को अनुशासित सैनिकों में बदलने की क्षमता रखते थे, उस भारत मां के अमर सपूत को देश के कर्णधार भूल चुके हैं। देश का नेतृत्व भले ही भुला दे, लेकिन गुप्तजी को यह देश कभी नहीं भूलेगा और आजादी की लड़ाई के इतिहास में उनका नाम सदा स्वर्णाच्छरों में लिखा जायेगा और अमर रहेगा।
    
ज्ञानेन्द्र रावत,
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक,
अध्यक्ष, राष्ट्र्ीय पर्यावरण सुरक्षा समिति,
आर.एस.ज्ञान कुंज, 1/9653-बी, गली नं-6, प्रताप पुरा, वैस्ट रोहताश नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032
मोबाइल: 9891573982

ई-मेल: rawat.gyanendra@rediffmail.com
rawat.gyanendra@gmail.com

 

 

अन्य विचार पढ़ें

 

 

Total votes: 181