समुद्री सीमा पर मंडराता आतंकी खतरा

02  अगस्त

@ ज्ञानेन्द्र रावत


आज समुद्री तटों की सुरक्षा का सवाल बड़ी चुनौती के रूप में देश के सामने आ खड़ा हुआ है। इस बात को अब केन्द्र सरकार भी मानती है कि मौजूदा हालात में तटीय सुरक्षा चाक-चैबंद करना समय की बहुत बड़ी जरूरत है। देश के तटीय क्षेत्रों में आतंकी खतरों को देखते हुए बीते दिनों मुंबई में सभी तटीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार इस मामले में गंभीर है। उन्होंने मुख्यमंत्रियों को आश्वस्त किया कि केन्द्र सरकार केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल की तरह ही तटीय पुलिस बल बनाने पर विचार कर रही है। तटीय सुरक्षा की दृष्टि से सभी राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों में समन्वय में बढ़ोतरी और गृह मंत्रालय एवं अन्य मंत्रालयों, नौसेना, तटरक्षक बल और तटीय पुलिस के सक्रिय सहयोग के जरिये सुरक्षा व्यवस्था में सुधार जारी रहेगा ताकि समुद्री इलाकों में कोई नया खतरा न पनप सके।


दरअसल बीते साल समुद्री रास्ते भारत में घुसपैठ करके 26/11 जैसा आतंकी हमला दोहराने की पाक की साजिश इस बात का सबूत है कि हमारी समुद्री सीमा पर भी आतंकवाद का खतरा मंडरा रहा है। वह बात दीगर है कि इस प्रयास को नाकाम कर दिया गया। केन्द्र सरकार और भारतीय नौसेना ने यह स्वीकार किया है कि समुद्री रास्तांे से आतंकवाद का खतरा तेजी से बढ़ा है। सच्चाई यह भी है कि हमारे समुद्री तटों पर खतरों का अंदेशा 1993 से ही होने लगा था जबकि रायगढ़ में विस्फोटकों की तस्करी का मामला सामने आया था। उसके बाद मुंबई में 2008 में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26/11 को हमला किया था। दरअसल बीते साल की घटना के बाद नौसेना प्रमुख ने भी माना कि आतंकी खतरों की वजह से समुद्री सीमा की सुरक्षा का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी स्वीकारा कि स्टेट एक्टर्स हों या फिर नाॅन स्टेट एक्टर्स, समुद्री रास्ते से आतंकवादी गतिविधियों से निपटने की बड़ी चुनौती हमारे सामने मुंह बाये खड़ी है। लेकिन दुख इस बात का है कि कई राज्यों में फैली समुद्र तटीय सीमा की रक्षा के लिए नौसेना पनडुब्बियों, गश्ती पोत, नौकाएं और निगरानी विमानों की भारी कमी से जूझ रही है। यही नहीं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण द्वीपों को भी दुश्मन की नजर से बचाने के लिए खासतौर से मैरीटाइम फोर्स बनाने की मांग भी बरसों से ठंडे बस्ते में पड़ी है। जबकि गौरतलब है कि इस बाबत कई पूर्व नौसेना प्रमुख दोहरा चुके हैं कि इसके बिना समुद्री तटीय व द्वीपों की सुरक्षा की आशा करना बेमानी है। बैठक में महाराष्ट्र् के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने सुझाव दिया कि समुद्र तट, बंदरगाहों और महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा के लिए केन्द्रीय समुद्री सुरक्षा पुलिस बल का गठन, तटीय ठिकानों और बंदरगाहों की इलैक्ट्र्ाॅनिक निगरानी बेहद जरूरी है। उनके अनुसार समुद्री पुलिस का कार्य विशेषज्ञता का होता है। तटीय सुरक्षा का काम तभी संभव है जब इसके लिए तटीय सुरक्षा की तकनीक की दृष्टि से प्रशिक्षित अलग से पुलिस बल हो।


दरअसल बीते बरसों में केरल के तट पर इटली के नौसैनिक पोत से उसके नौसैनिकों द्वारा गोलीबारी करके दो भारतीय मछुआरों की हत्या और अक्टूबर 2013 में तमिलनाडु में तूतीकोरिन के तट पर भारतीय तटरक्षक दल द्वारा जिन हालात में हथियारों से भरे समुद्री जलपोत सीमैन गार्ड का पकड़ा जाना बहुत कुछ कहता है बदलती दुनिया में बढ़ते खतरों के बारे में। गौरतलब है भारतीय समुद्री सीमा का उल्लंघन करने वाला यह जलपोत एक निजी अमरीकी सुरक्षा एजेंसी का था। इसकी महारत समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा मुहैया कराने की है। जबसे अफ्रीका के कई इलाकों म्रें समुद्री डाकुओं और लुटेरों का खतरा बढ़ा है, मालवाहक समुद्री जहाजों को दुनियाभर में सुरक्षा उपलब्ध कराने का एक नया कारोबार शुरू हुआ है। इसके बावजूद कई सवाल उठते हैं। समुद्री डाकुओं से सुरक्षा देनेे वाला यह जहाज भारत की समुद्री सीमा में कैसे पहुंचा, जबकि भारतीय समुद्री सीमा में न तो समुद्री डाकुओं-लुटेरों का खतरा है और न ही उस समुद्री जलपोत को भारत की तरफ ही आना था, जिसकी सुरक्षा में यह जलपोत तैनात था। यह जलपोत भटककर तो भारतीय सीमा में पहुंचा नहीं। विचारणीय यह है कि क्या अंतरराष्ट्र्ीय सुरक्षा उपलब्ध कराने का दावा करने वाला कोई जलपोत इतना दिशाहीन हो सकता है कि वह रास्ता भटक जाये?


जहां तक समुुद्री सीमा के दायरे में आने वाले एक्सक्लूसिव इकोनाॅमिक जोन की राष्ट्र्ीय संपत्तियों जैसे बंदरगाहों, व्यापारिक हब आदि को निशाना बनाये जाने की आशंका का सवाल है, इसमें संदेह नहीं कि इस तरह के खतरे और बढ़ेंगे। असल में 48 हजार वर्गकिलोमीटर में फैली तटीय संपत्तियों जैसे-रिफायनरियों, तेल उत्खनन क्षेत्रों, संचार लाइनों की सुरक्षा को भी चाक-चैबंद करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। संदिग्ध आतंकियों से भरी पाकिस्तानी नाव में धमाके की घटना के बाद मैरीटाइम फोर्स के गठन की जरूरत महसूस की जाने लगी है। जानकारों का मानना है कि 7517 किमी लम्बी तटीय रेखा, द्वीपों और तेल रिफायनरियों की हिफाजत राज्यों की मरीन पुलिस और कोस्टगार्ड के सहारे नहीं की जा सकती। मैरीटाइम फोर्स को निगरानी विमान और अन्य सर्विलांस सिस्टम से लैस होना चाहिए। हमारे यहां आतंकी खतरा किसी भी कीमत पर अमरीका से कम नहीं है। लेकिन तैयारी उंट के मुंह में जीरे के समान है। मुंबई मंे 26/11 हमले के बाद बैंकिंग, वित्तीय और परिवहन के क्षेत्र में आतंकी गतिविधियों की निगरानी के लिए नैटग्रिड की स्थापना की गई थी लेकिन यह अपने इरादों में नाकाम रही। आतंकवादी गतिविधियों की जांच और मुकदमा चलाने के लिए 31 दिसम्बर 2008 को राष्ट्र्ीय जांच ऐजेंसी का गठन किया गया था लेकिन वह आधे-अधूरे स्टाफ के चलते कुशलता से अपने काम को अंजाम नहीं दे पा रही। फिर एनआईए राज्य सरकार की मंजूरी के बिना कोई भी आतंकवाद से जुड़ा मामला अपने हाथ में ले नहीं सकती। चेन्नई विस्फोट का मामला इसका सबूत है।


हमारे यहां क्राइम ट्र्ैकिंग नैटवर्क एण्ड सिस्टम प्रोजेक्ट के तहत सभी पुलिस स्टेशनों को जोड़े जाने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन योजना कछुआ की चाल से चल रही है। मुंबई हमले से सबक लेते हुए संप्रग सरकार ने अमरीका की नेशनल काउंटर टैररिज्म सेंटर की तर्ज पर राष्ट्र्ीय आतंकवाद निरोधक ऐजेंसी का गठन किया था जिसे इंटैलीजेंस ब्यूरो के तहत काम करना था। लेकिन राज्य सरकारों के विरोध के चलते यह ऐजेंसी काम ही नहीं कर सकी। गौरतलब है कि अमरीका में एनसीटीसी आतंकवाद से जुड़े सभी मामलों मे खुफिया जानकारी तमाम ऐजेंसियों से इकटठा कर उनका विश्लेषण करती है। आतंकवाद रोधी अभियानों की निगरानी के साथ यह आतंकी घटनाओं से निपटने में सरकार को रणनीतिक सलाह भी देती है। नेशनल सिक्योरिटी गार्ड के पास स्थायी फौज नहीं है। इसमें जवान अर्धसैनिक बलों से क्रमशः तीन और पांच साल के डेपूटेशन पर आते हैं। इनके पास लाइव कैमरा, बातचीत सुनने के हाईटेक उपकरण, निगरानी और इंटरसैप्टिंग के उन्नत उपकरण भी नहीं हैं। इनके अभाव में आॅपरेशन पर असर पड़ना लाजिमी है। मुंबई हमले के बाद देश के चार बड़े महानगरों में एनएसजी का हब बनाया जाना था लेकिन वह गति नहीं पकड़ सका। इसके मोबाइल कमांड एण्ड कंट्र्ोल सेंटर नहीं हैं। उनके पास न खुद के विमान हैं और न गोलियों से बचने के लिए बैलेस्टिक शील्ड ही हैं।


सबसे बड़ी खामी राज्य की पुलिस और तटरक्षक बलों के बीच समन्वय के अभाव की है। महाराष्ट्र् में फोर्स वन और हैदराबाद ने आॅक्टोपस फोर्स के अलावा दिल्ली में विशेष कमान बनाई है। लेकिन इनके पास अनुभव की कमी है। वैसे तटीय इलाकों की निगरानी की दिशा में कदम बढ़े जरूर हैं। लेकिन इन्हैं कमतर ही कहा जायेगा। यह ऐसा समय है, जब समुद्री सीमाओं की चैकसी की और भी ज्यादा जरूरत है। सात साल पहले मुंबई में हुए हमले के आतंकवादी समुद्री रास्ते से ही भारत पहुंचे थे। फिलहाल तो भारत के सामने यह दिखाने का समय है कि अपनी समुद्री सीमा के किसी भी उल्लंधन को वह बर्दाश्त नहीं करेगा और उसकी सुरक्षा में कोई कोताही भी नहीं बरतेगा।

ज्ञानेन्द्र रावत
पत्रकार, लेखक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता
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