आम सहमति से नहीं होगा राष्ट्रपति चुनाव!

04  सितम्बर

अनिल जैन

अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर भाजपा की ओर से आम सहमति बनाने के कोई खास प्रयास नहीं किए जाएंगे। इसकी वजह है वोटों का गणित। सरकार और भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि वोटों का गणित स्पष्ट तौर पर भाजपा के पक्ष में है, लिहाजा उसे अपना उम्मीदवार जिताने के लिए एनडीए से बाहर किसी भी दल की मदद की जरुरत नहीं पड़ेगी। राष्ट्रपति के चुनाव में संसद और राज्यों की विधानसभाओं के सदस्य वोट करते हैं। यह निर्वाचक मंडल कुल 4896 सदस्यों का है और उनके वोट की कुल कीमत 10 लाख 98 हजार से कुछ ज्यादा हैं। भाजपा के हिसाब से एनडीए के पास बहुमत के लिए जरुरी वोट से दो फीसदी यानी करीब 22 हजार वोट ज्यादा हैं। उनका मानना है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद यह अंतर बढ़ जाएगा। असल में उत्तर प्रदेश के विधायकों के वोट की कीमत बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा है। अभी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सिर्फ 41 विधायक हैं और पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि यह संख्या बढ़ेगी। हो सकता है पंजाब में अकाली और भाजपा के विधायकों की संख्या कम हो जाए, लेकिन उत्तर प्रदेश में इतने वोट बढ़ जाएंगे कि उसे पंजाब, उत्तराखंड की फिक्र करने की जरुरत नहीं है।

भाजपाई मुख्यमंत्रियों को झटका

भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अब कोई भी महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला लेने में मनमानी नहीं कर पाएंगे। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने एक झटके में उनके पर कतर कर उन्हें संगठन के दायरे में ला दिया है। भाजपा के संविधान में व्यवस्था न होने के बावजूद अमित शाह ने राज्यों में पार्टी के कोर ग्रुप को संस्थागत रूप देकर उनको पार्टी संगठन में बेहद ताकतवर बना दिया है। अब कोर ग्रुप की सहमति के बगैर सरकार या पार्टी में कोई बड़ा फैसला नहीं होगा। कोर ग्रुप में मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के साथ प्रभारी, संगठन मंत्री और वरिष्ठ नेता भी होते हैं। माना जा रहा है कि इन सभी को साध पाना किसी भी मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होगा। इस नई व्यवस्था से सभी भाजपाई मुख्यमंत्री परेशान हैं, क्योंकि इससे सूबे में उनका दबदबा तो कम होगा ही साथ ही जब सारे फैसले कोर ग्रुप रूपी पंचायत में होंगे तो ढका-छुपा तो कुछ रहेगा ही नहीं।

उमा की तमन्ना

केंद्रीय मंत्री उमा भारती जल्दी ही पैदल होने वाली हैं। इस बात का संकेत कोई और नहीं वह खुद ही दे रही हैं। पिछले कुछ दिनों में यह अलबेली संन्यासिन एक से अधिक बार यह दोहरा चुकी हैं कि वह गंगा किनारे पदयात्रा करने वाली हैं। हाल ही में इलाहाबाद में गंगा की सफाई से संबंधित कार्यक्रम में भी उन्होंने यह बात दोहराते हुए कहा कि पता नहीं अगली बार वह यहां किस हैसियत से आएंगी- मंत्री की या पदयात्री की। उनके इस बयान ने उनकी पार्टी में कई अटकलों को जन्म दे दिया है। कुछ जानकार सूत्रों के मुताबिक जल संसाधन मंत्री के रूप में उमा के काम से प्रधानमंत्री खुश नहीं हैं, इसीलिए वह खुद बाहर होने की भूमिका बना रही हैं। एक चर्चा यह भी है कि उमा की तमन्ना उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनने की है। वह झांसी से सांसद होने के साथ ही पिछड़ा वर्ग से आती हैं और धार्मिक छवि तो उनकी है ही। यानी हर तरह से वह इस भूमिका के लिए अपने को फिट पाती हैं।

टिकटार्थियों की भीड़ नहीं है दिल्ली में

अगले साल की शुरुआत में पांच राज्यों - उत्तरप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लेकिन इन राज्यों के टिकट चाहने वालों की भीड़ दिल्ली में नहीं लग रही है। वैसे तो समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, अकाली दल और अन्य क्षेत्रीय पार्टी के टिकट संबंधित राज्यों की राजधानी में ही तय होते हैं लेकिन भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों का चयन दिल्ली से ही होता है, सो इन दलों के टिकटार्थियों की भीड़ दिल्ली में ही जुटती है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। भाजपा में मोदी-शाह युग की शुरुआत के बाद माहौल बदल गया है। अब पार्टी अध्यक्ष के अलावा किसी और पदाधिकारी या नेता की टिकट बंटवारे में कोई खास भूमिका नहीं रह गई है। इसलिए टिकट चाहने वाले दिल्ली की ओर नहीं भाग रहे हैं। कांग्रेस में प्रशांत किशोर के फार्मूले के आधार पर टिकटार्थी राज्यों की राजधानी में ही आवेदन कर रहे हैं। लेकिन माना जा रहा है कि अंतिम फैसला पंजाब में अमरिदर सिह और उत्तराखंड में हरीश रावत की सहमति से होगा। उत्तर प्रदेश के मामले में जरुर पंचायत लगेगी, लेकिन उसका भी मोटे तौर पर फैसला लखनऊ में ही होगा। सपा और बसपा में हमेशा की तरह सारे टिकटों का फैसला लखनऊ में ही होना है। आम आदमी पार्टी सिर्फ पंजाब में चुनाव लड़ रही है और उसके टिकट बंटवारे का सारा काम संजय सिह चंडीगढ़ में बैठकर ही कर रहे हैं।

अब आएंगे ऊंट पहाड़ के नीचे

वर्षों से राज्यसभा की शोभा बढ़ा रहे भाजपा के कई सांसद अपने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नए फरमान से हैरान-परेशान हैं। शाह ने हाल ही में अपनी पार्टी के राज्यसभा सदस्यों को निर्देश दिया है कि वे लोकसभा की एक-एक हारी हुई सीट गोद लेकर उसे पार्टी के लिए मजबूत करने में जुट जाएं। बाद में इस फरमान का आशय स्पष्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि राज्यसभा सदस्यों को भी जमीनी राजनीति से जुड़ना होगा। मोदी और शाह के इस फरमान का सीधा संकेत यह माना जा रहा है कि पार्टी के जो नेता दो-तीन या इससे भी ज्यादा बार राज्यसभा के लिए चुने जा चुके हैं उन्हें अब राज्यसभा का टिकट मिलने के आसार नहीं हैं। ऐसे में जिन राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल 2019 से पहले खत्म होने वाला है उन्होंने जातीय समीकरणों के लिहाज से अपने लिए अनुकूल सीट की तलाश शुरू कर दी है। हालांकि कुछ सांसद ऐसे भी है जो चुनाव लड़ने से ज्यादा संघ नेताओं को साधने में भरोसा रखते हैं।

और अंत में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अर्थशास्त्र बताता है कि देश में वे सारे राज्य आर्थिक रूप से पिछड़े और बीमारू हैं जहां गैर भाजपा सरकारें हैं और जहां जल्द ही चुनाव होने वाले हैं।

 

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