प्राकृतिक संसाधनों के अतिदोहन का परिणाम है धरती का विनाश

18  अगस्त

@ ज्ञानेन्द्र रावत


बीते दिनों ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क ने खुलासा किया है कि यदि दुनिया की आबादी आस्ट्रेलिया, अमेरिका, स्विटजरलैण्ड, दक्षिण कोरिया, रूस, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, स्पेन, चीन, ब्राजील आदि देशों के नागरिकों की जीवनशैली और पृथ्वी पर उपलब्ध संसाधनों के उपभोग के स्तर के हिसाब से जिंदगी व्यतीत करे तो बढ़ती आबादी की दृष्टि में कई पृथ्वियों की जरूरत पड़ेगी। वह बात दीगर है कि दुनिया के इन देशों की तुलना में भारत सबसे निचले स्थान पर है और भारतीयों की जीवनशैली पर्यावरण और जलवायु के काफी अनुकूल है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज धरती विनाश की ओर बढ़ रही है। इसका अहम् कारण तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में मानव का लगातार तेजी से बेतहाशा भागे चले जाना है। यह वास्तव में विनाश का मार्ग है। इसी विकास के दुष्परिणाम के चलते हुए बदलावों के कारण पृथ्वी पर दिन-ब-दिन बोझ बढ़ता जा रहा है। इसमें जलवायु परिवर्तन ने अहम् भूमिका निबाही है। यह एक गंभीर समस्या है जो समूची दुनिया के लिए भीषण खतरा है। इसे जानने-बूझने और सतत प्रयासों से पृथ्वी के इस बोझ को कम करने की बेहद जरूरत है। हम सबका दायित्व है कि पृथ्वी के उपर आए इस भीषण संकट के बारे में सोचें और इससे निजात पाने के उपायों पर अमल करने का संकल्प लें। भारत को ही लें, विचारणीय यह है कि हमारे यहां पृथ्वी की चिंता आज किसे है। किसी भी राजनीतिक दल से इसकी उम्मीद नहीं है। क्योंकि यह मुद्दा उनके राजनीतिक एजेंडे में है ही नहीं। कारण पृथ्वी वोट बैंक नहीं है। दुनिया जहांन के स्तर पर सोचें तो पृथ्वी हमारे अस्तित्व का आधार है, जीवन का केन्द्र है। वह आज जिस स्थिति में पहुंच गई है, उसे वहां पहुंचाने के लिए हम ही जिम्मेवार हैं। आज सबसे बड़ी समस्या मानव का बढ़ता उपभोग है। कोई यह नहीं सोचता कि पृथ्वी केवल उपभोग की वस्तु नहीं है। वह तो मानव जीवन के साथ-साथ लाखों-लाख वनस्पतियों-जीव-जंतुओं की आश्रयस्थली भी है। इसके लिए खासतौर से उच्च वर्ग, मध्य वर्ग, सरकार और संस्थान सभी समान रूप से जिम्मेवार हैं जो संसाधनों का बेदर्दी से इस्तेमाल कर रहे हैं। जीवाश्म ईंधन का पृथ्वी विशाल भंडार है लेकिन इसका जिस तेजी से दोहन हो रहा है, उसकी मिसाल मुश्किल है। इसके इस्तेमाल और बेतहाशा खपत ने पर्यावरण के खतरों को निश्चित तौर पर चिंता का विषय बना दिया है। जबकि यह नवीकरणीय संसाधन नहीं है और इसके बनने में लाखों-करोड़ों साल लग जाते हैं।

असलियत में इस्तेमाल में आने वाली हर चीज के लिए, भले वह पानी, जमीन, जंगल या नदी हो, कोयला, बिजली या लोहा आदि  प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में हमने कीर्तिमान बनाया है। दरअसल बढ़ती आबादी का पानी, भोजन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आज खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। आलम तो यह है कि धरती पर साल भर में होने वाले प्राकृतिक संसाधनों के उत्पादन के बराबर उपभोग तो हमने बीते सात महीनों में ही कर लिया है। इसका खुलासा ग्लोबल फुटप्रिंट नेटबर्क और ग्लोबल फुटप्रिंट एकाउंट ने किया है। इसके अनुसार बीते सात महीने और एक हफते में ही धरती पर साल भर में बने प्राकृतिक संसाधनों को मानव द्वारा हड़प लिया गया है। हर साल उन्नीस दिसम्बर के स्थान पर बीती आठ अगस्त को अर्थ ओवरशूट डे का मनाया जाना इसका जीता-जागता सबूत है। ग्लोबल फुटप्रिंट नेटबर्क के सीईओ मैथिस वैंकरनेगल की मानें तो औद्योगिक विकास और शहरीकरण के मुकाबले समुद्रों, जंगलों, नदियों और जीव-जंतुओं की सुरक्षा के लिए अभी तक जो भी प्रयास किये गए हैं, वह नाकाफी हैं। क्योंकि इनका उपभोग बेतहाशा किया गया है जबकि संरक्षण हेतु किए जाने वाले प्रयास नगण्य ही हैं। नतीजतन जैवविविधता पर संकट मंडराने लगा है। प्रदूषण की अधिकता के कारण देश की अधिकांश नदियां अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। उनके आस-पास स्वस्थ जीवन की कल्पना बेमानी है। कोयलाजनित बिजली से न केवल प्रदूषण यानी पारे का ही उत्र्सजन नहीं होता ,बल्कि हरे-भरे समृद्ध वनों का भी विनाश होता है। फिर उर्जा के दूसरे स्रोत और सिंचाई के सबसे बड़े साधन बांघ समूचे नदी बेसिन को ही खत्म करने पर तुले हैं। रियल एस्टेट का बढ़ता कारोबार इसका जीता-जागता सबूत है कि वह किस बेदर्दी से अपने संसाधनों का बेतहाशा इस्तेमाल कर रहा है।

आईपीसीसी के अध्ययन खुलासा करते हैं कि बीती सदी के दौरान पृथ्वी का औसत तापमान 1.4 फारेनहाइट बढ़ चुका है। अगले सौ सालों के दौरान इसके बढ़कर 2 से 11.5 फारेनहाइट होने का अनुमान है। इस तरह धीरे-धीरे पृथ्वी गर्म हो रही है। पृथ्वी के औसत तापमान में हो रही यह बढ़ोतरी जलवायु और मौसम प्रणाली में व्यापक स्तर पर विनाशकारी बदलाव ला सकती है। इसके चलते जलवायु और मौसम में बदलाव के सबूत मिलने शुरू हो ही चुके हैं। वर्षा प्रणाली में बदलाव के कारण गंभीर सूखे, बाढ़, तेज बारिश और अक्सर लू का प्रकोप दिखाई देने लगा है। महासागरों के गर्म होने की रफ्तार में इजाफा हो रहा है। वे अम्लीय होते जा रहे हैं। समुद्रतल के दिनों-दिन बढ़ते स्तर से हमारे 7517 किलोमीटर लम्बे तटीय सीमावर्ती इलाकों को भीषण खतरा है। हिमाच्छादित ग्लेशियर और चोटियां तेजी से पिघलने लगे हैं। एक शोध के जरिये भूविज्ञानियों ने खुलासा किया है कि पृथ्वी में से लगातार 44 हजार बिलियन वाॅट उष्मा बाहर आ रही है। पृथ्वी से निकलने वाली कुल गर्मी के आधे हिस्से का लगभग 97 फीसदी रेडियोएक्टिव तत्वों से निकल रहा है। एंटी न्यूट्र्निो न केवल यूरेनियम, थोरियम और पोटेशियम के क्षय से पैदा हो रहे हैं बल्कि परमाणु उर्जा रिएक्टरों से भी ये निकल रहे है। यह भयावह खतरे का संकेत है।

वैज्ञानिकों के अनुसार जनसंख्या वृद्धि से धरती के विनाश का खतरा मंडरा रहा है। इससे वे सभी प्रजातियां खत्म हो जायेंगीं जिन पर हमारा जीवन निर्भर है। कुछ वर्णसंकर प्रजातियां उत्पन्न होंगी, फसलें बहुत ज्यादा प्रभावित होेंगी और वैश्विक राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा हो जायेगी। नतीजन कुछ ऐसे अप्रत्याशित बदलाव होंगे जो पिछले 12000 वर्षों से नहीं हुए हैं। जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी में आए बदलावों पर किए अनुसंधानों के विश्लेषण के उपरांत कैलीफोर्निया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रो. एंटनी बार्नोस्की का कहना है कि इस बात की प्रबल संभावना है कि इस सदी के अंत तक धरती का बहुत हद तक स्वरूप बदल जायेगा। इस विनाश के लिए जल, जंगल और कृषि भूमि का अति दोहन जिम्मेवार है। वह बात दीगर है कि जलवायु परिवर्तन समझौता देरी से उठाया गया कदम है। फिर भी यह सच है कि प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन पर अंकुश लगाये बिना जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमारा संघर्ष अधूरा रह जायेगा। इस सच की स्वीकारोक्ति कि हम सब पृथ्वी के अपराधी हैं, इस दिशा में पहला कदम होगा। इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी जीवनशैली पर पुर्नविचार करना होगा। अपने उपभोग के स्तर को कम करना होगा। स्वस्थ जीवन के लिए प्रकृति के करीब जाकर सीखना होगा। चंूकि हम सब पृथ्वी को हरपल भोगते हैं, इसलिए पृथ्वी के प्रति अपने दायित्व का हमेशा ध्यान रखें और हरदिन उसका निर्वहन भी करें। हमें यह जानना होगा कि यह दुर्दशा प्रकृति और मानव के विलगाव की ही परिणति है। सरकारों के लिए यह जरूरी है कि वे विकास को मात्र आर्थिक लाभ की दृष्टि से न देखें बल्कि, पर्यावरण को भी विकास का आधार बनायें। हमें पृथ्वी के प्रहरी बनकर उसे बचाने और आवश्यकतानुरूप उसके उपभोग का संकल्प लेना होगा। इस हेतु दूसरों को भी प्रेरित करना होगा। तभी हम धरती को लम्बी आयु प्रदान करने में समर्थ हो सकते हैं। यह विकास के ढांचे में बदलाव लाये बिना असंभव है। अन्यथा जिस गति से आबादी में वृद्धि हो रही है, उसके हिसाब से यानी पृथ्वी पर जो प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं, उनके उपभोग की दृष्टि से तो कई पृथ्वियों की जरूरत होगी। इसे झुठलाया नहीं जा सकता।

ज्ञानेन्द्र रावत,
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक,
अध्यक्ष, राष्ट्र्ीय पर्यावरण सुरक्षा समिति,
आर.एस.ज्ञान कुंज, 1/9653-बी, गली नं-6, प्रताप पुरा, वैस्ट रोहताश नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032
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