अभी भी सुरक्षित नहीं हैं देश के बंदरगाह

09  सितम्बर

 

@ ज्ञानेन्द्र रावत

बीते साल से ही इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही है कि देश के बंदरगाहों पर कभी भी आतंकी हमला हो सकता है। केन्द्रीय खुफिया एजेंसियां देश में 26/11 के मुंबई हमले की तर्ज पर समुद्री रास्ते से आतंकी हमले और हवाई रास्तों से हमलों की आतंकियों की योजना से महीनों पहले ही आगाह कर चुकी हैं। यह भी कि आतंकी तटीय स्थलों जैसे बंदरगाहों, कोच्चि स्थित दक्षिणी नौसैनिक कमान, आईएनएस वैंदुरथी, मुंबई स्थित पश्चिमी नौसैनिक कमान और आईएनएस कदंबा को निशाना बना सकते हैं। सरकार दावे कुछ भी करे, असलियत में हमारी तटीय सुरक्षा में बहुत बड़ी खामियां हैं। दावे यह भी किए जा रहे हैं कि सरकार ने बंदरगाहों की सुरक्षा की खातिर हर तरह की वित्तीय व तकनीकी सहायता उपलब्ध करायी है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मानें तो सरकार देश के बड़े बंदरगाहों एवं उनकी सेवाओं को उन्नत बनाने के लिए उन्हें कंपनी कानून के दायरे में लाने के प्रस्ताव से भी आगे के विकल्पों की तलाश कर रही है और बंदरगाहों को आधुनिक रूप देने और उनका विकास किए जाने के अपने निर्णय पर आमादा है। लेकिन उन्हें इससे पहले यह सोचना होगा कि देश के 187 बंदरगाहों की सुरक्षा में गंभीर खामियां हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री भी इसको स्वीकारते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गोवा और ओडिसा जैसे राज्यों में स्थित बंदरगाहों पर सुरक्षा की जांच के लिए भी पर्याप्त इंतजाम न होने और उसमें गंभीर खामियों को लेकर लम्बे अरसे से सवाल उठते रहे हैं। इसका खुलासा बीते साल हो ही चुका है। क्या इन खामियां को दूर किए इन बंदरगाहों को आधुनिक रूप देना और इनका विकास संभव है? इन बंदरगाहों में गुजरात के 21 पोर्ट, महाराष्ट्र् के 9, आंध्र प्रदेश के 5, तमिलनाडु के 6, कर्नाटक और पुडुचेरी के 2-2, और उड़ीसा, अंडमान-निकोबार, केरल और गोवा के एक-एक बंदरगाह शामिल हैं। ये खामियां ही आतंकी समूहों को हमले करने के लिए रास्ता प्रदान करती हैं। इन खामियों का लश्कर जैसे आतंकी संगठन बखूबी फायदा उठाकर आतंकी हमला कर सकते हैं।

बीते दिनों सरकार ने देश के सभी छोटे-बड़े बंदरगाहों की सुरक्षा को लेकर समीक्षा की। क्योंकि पिछले साल ही खुफिया ब्यूरो ने आगाह किया था कि देश के अलग-अलग राज्यों में करीब 203 बड़े बंदरगाहों से इतर या छोटे बंदरगाहों में से 75 पर कोई सुरक्षा बल मौजूद नहीं है। इसके अलावा 45 बंदरगाहों पर परिचालन नहीं है। परिचालन न होने वाले बंदरगाहों को घाट के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इन पर न सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, कुछ पर एक्सरे मशीन तक नहीं है। संचार का इनकमिंग-आउटगोइंग रिकार्ड नहीं है। पहरेदारी के लिए अंदर और बाहर ट्र्ैक तक नहीं बने हैं। समय-समय पर मॉक ड्र्लि का अभाव है। बंदरगाहों के गेट पर स्पीड ब्रेकर दिखाई नहीं देते। अक्सर बंदरगाहों का इस्तेमाल मछली पकड़ने के काम में होता है जबकि बंदरगाहों को ऐसे कामों से निषिद्ध क्षेत्र के रूप में घोषित कर देना चाहिए। बंदरगाहों के गेट और उनके प्रशासनिक कार्यालयों में एक्सरे स्कैनर न होने से कर्मचारियों की आवाजाही पर न तो निगरानी की जा सकती है और न आने-जाने वालों के सामान को स्कैन किया जा सकता है। पोर्ट पर विदेशियों के संबंध में पूरी जानकारी यथा उनका नाम, पासपोर्ट की जानकारी, रुकने का समय और उद्देश्य का रिकार्ड तक नहीं रखा जाता। न कर्मचारियों के टिफिन बॉक्स की पूरी जांच होती है। बंदरगाह के घाट इलाके में उचित उंचाई के वॉच टॉवर तक नहीं हैं जिससे समुद्री इलाके की हर तरफ से निगरानी हो सके। गौरतलब है कि इन खामियों का खुलासा करते हुए गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट में इस बात पर अचम्भा जाहिर किया कि मुंबई हमले के बाद भी देश में 187 छोटे बंदरगाहों पर सुरक्षा में इतनी भीषण खामियां हैं और सरकार मौन है।

गौरतलब है कि 2008 में 26/11 के मुंबई हमले के लिए आतंकी समुद्री रास्ते से ही आए थे। यही नहीं 1993 के बम धमाकों में इस्तेमाल किए गए विस्फोटक को भी समुद्री रास्ते से ही लाया गया था जिसे वलसाड के तट पर उतारा गया था। 2014 में 31 दिसम्बर को घुसपैठ कर रही नौका को इंडियन कोस्ट गार्ड ने हमला कर नष्ट कर डाला था। उस स्थिति में जबकि हमारी समुद्री सीमा 7516 किलोमीटर लम्बी है जो देश के 9 राज्यों और 4 केन्द्र शासित प्रदेशों की सीमा से लगती है। इसमें सबसे ज्यादा 1600 किलोमीटर सीमा अकेले गुजरात में है जबकि 720 किलोमीटर समुद्री सीमा महाराष्ट्र् में है। यह हालत तब है जबकि 10,440 जवान, 143 पोत और 60 एयरक्राफ्ट कोस्टगार्ड के पास हैं। इसके अलावा मुंबई पुलिस के पास तटीय सुरक्षा के लिए कोयना, भीमा, कावेरी और पूर्णा नामक चार बुलेटप्रूफ बोट हैं। इसमें संदेह नहीं है कि नवम्बर 2008 के बाद भारतीय तटरक्षकों को काफी सुविधाएं मुहैया करायी गईं जिनमें नए सीजी स्टेशन स्थापित करना, जहाजों, जेट विमानों की निगरानी बढ़ाना आदि शामिल था। लेकिन इस पूरी कवायद के नतीजे बेहद निराशाजनक निकले। कैग की रिपोर्ट का निष्कर्ष कि इंडियन कोस्ट गार्ड की कार्यप्रणाली लचर है, जाहिर करती है कि अभी भी भारत की तटीय निगरानी व सुरक्षा में बड़े छिद्र मौजूद हैं। एक हजार टन वजनी व्यावसायिक जहाज एमवी पविट और 9000 टन वजनी जहाज एमवी विजडम के मुंबई के जुहू बीच पर डूबने की घटनाएं इसकी सबूत हैं।

दरअसल सुसंगत राष्ट्र्ीय सुरक्षा रणनीति के तहत भारत की तटीय सुरक्षा हालातों को मद्देनजर सरकार द्वारा देश की तटीय सुरक्षा के कारणों की पड़ताल करते हुए उनका समाधान सुनिश्चित करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए थी जो समय की मांग थी। लेकिन ऐसा नहीं कर देश की सत्ता पर काबिज सरकारें संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थों का शिकार होती रहीं। असलियत में बंदरगाहों की सुरक्षा की दृष्टि से आज सैकड़ों की तादाद में बड़़ी नौकाएं, इंटरसेप्टर नौकाएं, मरीन ऑपरेशन सेन्टर, इन्पलेटेबल नौकाओं की बेहद जरूरत है। विशेष श्रेणी की 75 नौकाओं से कुछ नहीं होने वाला, जिनके निर्माण का जिम्मा हाल ही में गोवा शिपयार्ड लिमिटेड को सौंपा गया है। वह बात दीगर है कि सरकार अब छोटे बंदरगाहों की सुरक्षा में सेंध की संभावना को देखते हुए और समुद्री इलाकों की निगरानी के लिए 150 से ज्यादा आधुनिक खुफिया उपकरणों से लैस समुद्री नौकाएं तैनात करने पर विचार कर रही है। समुद्री क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए खुफिया सूचनाओं के संग्रह पर जोर दिया जाना बेहद जरूरी है। इस सम्बंध में सकारात्मक उपाय तलाशने की दिशा में त्वरित प्रयास किए जायें। भारतीय नौसेना की चुनौतियों का पुर्नविचार कर सामना करने के लिए और एकलबिंदु नेशनल मैरीटाइम की स्थापना करने के लिए ब्ल्यूरिबन टॉस्क फोर्स का गठन करना चाहिए। सबसे अहम् बात यह कि इसी टॉस्क फोर्स पर तटीय सुरक्षा का पूरा दारोमदार होना चाहिए। इसके अलावा भारतीय सैन्य क्षमताओं का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विस्तृत विश्लेषण किया जाना चाहिए। साथ ही उन संस्थानों को चिन्हित किया जाना चाहिए जो तटीय सुरक्षा और निगरानी में चूक के लिए जिम्मेदार हैं। वह बात दीगर है कि भारतीय नौसेना अगले दशक की चुनौतियों से निपटने में सक्षम होने का ढिंढोरा पीटती रहे और कहे कि देश में भविष्य में मुबई हमलों की पुनरावृत्ति न हो, इसलिए अब देश की दो लाख नावों में ’पेइस’ यानी पायलट ऑटोमेटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम लगाने जा रही है ताकि देश की समुद्री सीमा के 12 नॉटिकल मील तक तट रक्षक बल द्वारा निगरानी रखी जा सके। इससे नौका की भारतीय समुद्र तट से दूरी, उसकी लोकेशन की भी जानकारी हो सकेगी। अब देखना यह है कि समुद्री सुरक्षा के दूसरे चरण की योजना को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी कब तक अपनी मंजूरी देती है। लेकिन अभी तो मौजूदा चुनौतियों का सामना करना बेहद जरूरी है।

ज्ञानेन्द्र रावत,
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक,
अध्यक्ष, राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा समिति,
आर.एस.ज्ञान कुंज, 1/9653-बी, गली नं-6, प्रताप पुरा, वैस्ट रोहताश नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032
मोबाइल: 9891573982

ई-मेल: rawat.gyanendra@rediffmail.com
rawat.gyanendra@gmail.com

 

 

 

अन्य विचार पढ़ें

Total votes: 226