क्या तीन तलाक जायज है?

06  सितम्बर

@ ज्ञानेन्द्र रावत

बीती 26 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैरकानूनी बताने वाली और दूसरे विवाह की स्थिति में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को तय करने सम्बंधी याचिकाओं पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को जारी नोटिस पर बोर्ड ने गत दिवस सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दाखिल कर कहा है कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिखा जा सकता। कुरान में तलाक गैरजरूरी है लेकिन जरूरत पडने पर दिया जा सकता है। बोर्ड ने अपने शपथ पत्र. में कहा है कि पहले भी कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट तय कर चुका है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके। यह कानून कुरान की रीतियों से लिया गया है। बोर्ड के अनुसार तलाक, विवाह और भरण-पोषण  अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग हैं। एक धर्म के अधिकार को लेकर कोर्ट फैसला नहीं दे सकता। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नोटिस पर अभी केन्द्र सरकार का पक्ष आना बाकी है। इस मामले में जानी-मानी वकील इंदिरा जयसिंह का मुम्बई हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले के हवाले से कहना है कि पर्सनल लॉ व्यवस्था को मूल अधिकारों से नहीं जोड़ा जा सकता। जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है, वह पहले ही इस बात को साफ कर चुका है कि मुस्लिम समुदाय में तीन बार तलाक बोलकर वैवाहिक सम्बंध तोड़ना एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है जो एक बड़े तबके को प्रभावित करता है। इसे संवैधानिक ढांचे की कसौटी पर कसे जाने की बेहद जरूरत है। इस मुद्दे पर दोनों ओर बहुत प्रबल विचार हैं। एक कहता है कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, जबकि दूसरे का विपरीत मत है। हमें मुद्दे का निपटारा करते वक्त इस बात पर भी गौर करना होगा कि पिछले फैसलों में क्या कोई गलती हुई है।

दरअसल हुआ यह कि तकरीब दो महीने पहले तीन बार तलाक कह कर विवाह सम्बंध खत्म करने की व्यवस्था के खिलाफ देश के गुजरात, महाराष्ट्र्, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, ओडिसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, केरल और उत्तर प्रदेश की पचास हजार मुस्लिम महिलाओं ने राष्ट्र्ीय महिला आयोग को एक पत्र लिखा था। देश के इतिहास में मुस्लिम महिलाओं द्वारा इस दिशा में उठाया गया यह एक महत्वपूर्ण कदम तो है ही, ऐतिहासिक भी है। जबकि कुछ मुस्लिम धर्मगुरू इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं क्योंकि वह तीन तलाक को अल्लाह के कानून का हिस्सा मानते हैं। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड की शायरा बानू ने तीन बार तलाक कहकर तुरंत तलाक देने की इस व्यवस्था के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सायरा बानू ने लिंग और धर्म के आधार पर समानता के अधिकार की मांग की है। वहीं हावड़ा की 26 वर्षीय इशरतजहां ने अपने पति द्वारा दुबई से फोन द्वारा तलाक दिये जाने, पति द्वारा बच्चों को जबरन छीन लिए जाने के खिलाफ और बच्चों को वापस दिलाने व बंगाल पुलिस से सुरक्षा दिलाने हेतु सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। क्या तीन तलाक जायज है, इस सवाल पर भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की ओर से राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमार मंगलम को दिये 50 हजार मुस्लिम महिलाओं के हस्ताक्षरयुक्त पत्र में कहा गया है कि कुरान में तलाक की ऐसी किसी व्यवस्था का कोई जिक्र नहीं है। इसके मुताबिक मुसलमान महिलाओं को भी संविधान में अधिकार मिले हैं। आंदोलन की अध्यक्ष नूरजहां साफिया नियाज ने कहा है कि यदि कोई कानून न्याय और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है तो उस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। गौरतलब है कि इसी साल जनवरी माह में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को परिभाषित करने के लिए जारी संविधान पीठ की सुनवाई के दौरान ही मुंबई हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि तीन बार तलाक शब्द के उच्चारण पर तैयार किए गए तलाकनामे से तलाक वैध नहीं हो जाता।  

इस बारे में उत्तर प्रदेश की पहली महिला काजी हिना जहीर नकवी कहती हैं कि असलियत में इसका भारी दुरुपयोग हो रहा है। इसने मुस्लिम महिलाओं की जिन्दगी को खतरे में डाल दिया है। यह कुरान की आयतों की गलत व्याख्या है। प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का कहना है कि शरिया कानून की वजह से ही मुसलमानों में पिछड़ापन है। आज समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की जरूरत है। वे तीन बार तलाक कह कर निकाह तोड़ने के सख्त विरोधी हैं। इस्लाम और महिला मुद्दों पर अपनी बेबाक राय के लिए विख्यात लेखिका शीबा असलम फहमी ट्र्पिल तलाक को गैर इस्लामी मानती हैं। धर्म के नाम पर इसे वे मुल्लाओं की दादागीरी करार देती हैं। उनके अनुसार ये कुरान के मुताबिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद कहते हैं कि ट्र्पिल तलाक जैसी कोई चीज है ही नहीं। ये सब तब के लिए संभव था जब काजी का इस्लामिक कोर्ट हो। इसे दस लोग तय नहीं कर सकते। वरना यह खाप जैसा होगा। अंजुमन मिन्हाजे रसूल के प्रमुख मौलाना अथर हुसैन दहलवी के मुताबिक पैगम्बर के लिए सबसे नापसंद चीज है तलाक। ये इमरजेंसी एग्जिट डोर था और इसे परमानेंट डोर बनाने की कोशिश की गई। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना मोहम्मद वली रहमानी कहते हैं कि इस्लामी हुक्म का मतलब सिर्फ कुरान का हुक्म नहीं है। कुरान के साथ टेल्स ऑफ द प्रौफिट भी है। उसे समझना होगा। ट्र्पिल तलाक इस्लाम के हिसाब से क्रिमिनल एक्ट है। किसी ने यदि ट्र्पिल तलाक लिया है, तो तलाक तो हो जायेगा लेकिन वो अपराध है।

असलियत में यदि हम भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के सर्वे की मानें तो 92.2 फीसदी मुस्लिम महिलाएं ट्र्पिल तलाक के खिलाफ हैं। वे बहुविवाह के भी खिलाफ हैं। वे अपने पति को किसी भी कीमत में बांटना नहीं चाहतीं। 90 फीसदी औरतों की मांग है कि कानूनी सिस्टम के जरिए काजियों पर नियंत्रण रखा जाये। असल में शरीयत के कानूनों की ठीक तरह से व्याख्या न होने के कारण मुस्लिम पुरुष बिना सोचे-समझे, मनमाने ढंग से अपनी बीबियों को तलाक देते हैं। तलाकशुदा औरत के भविष्य की न तो पति को परवाह होती है और न ही समाज को। उसका कोई पुरसाहाल नहीं होता। मौखिक तलाक को तो पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, तुर्की, ईराक, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया जैसे मुस्लिम देशों में गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है। जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मौखिक तलाक की जरूरत पर बल देता है। गौरतलब है कि इस मामले में मुस्लिम समाज के अन्दर से, खासतौर से मुस्लिम महिलाएं और उनके महिला संगठन आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनके प्रयास का परिणाम है मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड।  इसकी अध्यक्ष शाइस्ता अंबर बीते कई सालों से तीन तलाक के कानून को खत्म किए जाने की पुरजोर आवाज उठा रही हैं। उनके प्रयास और मुस्लिम समाज के उदारवादियों का एक बड़ा वर्ग इस तरह के कानूनों को बदले जाने का पक्षधर है। उसका कितना असर पूरे मुस्लिम समाज पर पड़ा है या किस सीमा तक ऐसे लोगों के विचार पूरे समाज की मुख्यधारा बन पाने में कामयाब हो सके हैं, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि इसमें निहित स्वार्थी कट्टरपंथी तत्वों और राजनीतिक दलों की राजनीति सबसे बड़ी बाधा बनेगी। वे किसी भी कीमत पर नहीं चाहेंगे कि इस तरह का कोई बदलाव संभव हो। इतना तय है कि इस लड़ाई से बदलाव की बयार अब मुस्लिम समुदाय में बह चली है। इसे रोक पाना अब आसान नहीं है। मुस्लिम महिलाओं की यह लड़ाई लम्बी चलेगी, इसे झुठलाया नही जा सकता। सरकार इस मामले में क्या रुख अख्तियार करती है, यह भविष्य के गर्भ में है।

ज्ञानेन्द्र रावत,
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक,
अध्यक्ष, राष्ट्र्ीय पर्यावरण सुरक्षा समिति,
आर.एस.ज्ञान कुंज, 1/9653-बी, गली नं-6, प्रताप पुरा, वैस्ट रोहताश नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032
मोबाइल: 9891573982

ई-मेल: rawat.gyanendra@rediffmail.com
rawat.gyanendra@gmail.com

 

 

 

अन्य विचार पढ़ें

 

 

Total votes: 185