प्रधानमंत्री निवास में प्रचारकों का जमावड़ा

03  अक्टूबर

@ अनिल जैन

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने प्रचारकों और भाजपा पदाधिकारियों को कसना शुरू कर दिया है। बीते दिनों दिल्ली से सटे हरियाणा के सूरजकुंड में बतौर संगठन मंत्री भाजपा में काम कर रहे संघ के प्रचारकों और पार्टी के अन्य पदाधिकारियों की संघ पदाधिकारियों के साथ बैठक हुई। चार दिन चली इस बैठक में संघ के पदाधिकारियों ने संगठन मंत्रियों से अपने-अपने राज्य में भाजपा के कामकाज की स्थिति का ब्यौरा लिया। संघ और भाजपा के पदाधिकारियों की बैठक भी हुई जिसमें सरकार के कामकाज पर विचार-विमर्श और जानकारियों का लेन-देन हुआ। बैठक के आखिरी दिन इन संगठन मंत्रियों का जमावड़ा प्रधानमंत्री निवास में लगा जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक हुई। बैठक का फोकस उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर था। इस बैठक में चुनाव तैयारियों का रोडमैप बना। सूत्रों के मुताबिक अक्टूबर के अंत तक बाहर के राज्यों के कोई 450 पूर्णकालिक प्रचारक उत्तरप्रदेश के एक-एक विधानसभा क्षेत्र में जा कर जुट जाएंगे। दीपावली के बाद नवंबर में और पांच सौ प्रचारक उत्तर प्रदेश में तैनात होंगे। ये सभी प्रचारक अपने राज्य और अपने इलाके से कार्यकर्ताओं की टीम लाकर विधानसभा क्षेत्रों को संभालेंगे।

सरकारों में संघ के ओएसडी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने एजेंडे और अपने पचास से ज्यादा सहोदर संगठनों की फिक्र करते हुए सरकार और संगठन में तालमेल बैठाने के लिए 25-30 ओएसडी या निजी सहायक नियुक्त कराए हैं। भाजपा के मुख्यमंत्रियों शिवराजसिह चौहान, वसुंधरा राजे, देवेंद्र फड़नवीस, रमन सिह, मनोहरलाल खट्टर, रघुवर दास आदि लेकर कई मंत्रियों के यहां ऐसी नियुक्तियां ओएसड़ी या सहायक के नाते हुई हैं। नियुक्त हुए ये तमाम लोग खांटी स्वयंसेवक और प्रशासनिक क्षमता वाले हैं और सरकार या सार्वजनिक उपक्रमों, बैंक आदि की सेवा से प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए हैं। भाजपा में संघ के प्रभारी कृष्ण गोपाल और भाजपा के संगठन मंत्री रामलाल का दायित्व है कि वे बनी सूची अनुसार जो जहां के लिए उपयुक्त हो, चहां उन्हें पहुंचाएं। इस कवायद के प्रदेश की राजधानियों में मंत्रियों के पुराने स्टाफ और मीडियाकर्मियों में कई मतलब निकाले जा रहे हैं लेकिन हकीकत यही है कि यह व्यवस्थागत कार्यवाही है। अभी तक संघ के स्वयंसेवकों की शिकायतों की शिकायत रही है कि हम काम बताते हैं, मंत्री मान भी लेते हैं लेकिन अफसरशाही काम नहीं होने देती। इसलिए प्रशासनिक ढर्रे को जानने, समझने, काम निकलवाने में समर्थ व्यक्ति को ओएसडी बना कर उम्मीद की जा रही है कि इससे तालमेल भी बनेगा और काम भी सधेगा। मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के कामकाज पर निगरानी रहेगी।

 

शाह ने कसी प्रवक्ताओं पर लगाम

उड़ी में सेना के कैंप पर आतंकवादी हमले की घटना को लेकर कोझीकोड में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक का एजेंड़ा बदलने की आशंका के चलते पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को काफी सख्ती बरतनी पड़ी। टीवी का कैमरा और माइक सामने आते ही मुंह खोलने को बेताब रहने वाले पार्टी के सभी नेताओं को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से पहले उड़ी हमले के मामले में चुप रहने की सख्त हिदायत दी। प्रवक्ताओं और मीडया पैनल में शुमार नेताओं से भी साफ कहा गया कि कोई भी इस मसले पर कुछ नहीं बोलेगा। सबसे सख्त टिप्पणी करने वाले राम माधव को तो चलती प्रेस कांफ्रेंस से ही बुलाकर कहा गया कि वे इस मामले पर अपने तेवर ढीले रखे। राष्ट्रीय परिषद की बैठक से एक दिन पहले पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में एक नेता ने उड़ी हमले का जिक्र किया तो उसे भी फौरन चुप करा दिया गया। संगठन के एक बड़े नेता ने तो यहां तक कह दिया कि अगर किसी को टीवी पर बोलने का ज्यादा ही शौक हो तो अपने भविष्य के बारे में सोचकर ही बोलें।

जेठमलानी के वकील लालू!

वैसे तो राम जेठमलानी खुद ही नामचीन और दुस्साहसी वकील हैं। बड़े-बड़े लोग उनकी काबिलियत का लोहा मानते हैं। लेकिन जबसे चारा घोटाले में उन्होंने लालू प्रसाद यादव को जमानत दिलवाई है, खुद लालू ही उनके सबसे बड़े वकील बन गए हैं। राजनीतिक बिरादरी में जो भी व्यक्ति किसी मामले में कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसा होता है, लालू यादव उसके समक्ष जेठमलानी की काबिलियत का बखान करते हुए उन्हें अपना वकील करने की सलाह बिना मांगे दे डालते हैं। बताया जाता है कि लखनऊ के चर्चित गेस्ट हाउस कांड की सुनवाई शुरू होने पर लालू ने ही मुलायम सिह यादव को जेठमलानी को वकील रखने की सलाह दी थी। हाल ही में जब सीवान के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन जेल से रिहाई के बाद फिर से कानूनी दांव-पेंच मे फंसते दिखे तो लालू ने उन्हें भी जेठमलानी को वकील बनाने की सलाह दी। दोनो लोगों ने लालू की सलाह मानी भी। लालू यादव जेठमलानी पर इस कदर फिदा हैं कि उन्होंने अपनी पार्टी के दूसरे कद्दावर नेताओं की नाराजगी की परवाह किए बगैर पिछले दिनों जेठमलानी को अपनी पार्टी से राज्यसभा में भी पहुंचा दिया।

 

सियासत इसी का नाम है!

कावेरी जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच ठनी हुई है। कर्नाटक अपने पड़ोसी राज्य को पानी न देने की जिद पर इस कदर अड़ा हुआ है कि उस पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश और डांट-फटकार का भी असर नहीं हो रहा है। उसका यह रवैया अदालत की अवमानना भी माना जा सकता है। इस स्थिति से परेशान तो कांग्रेस नेतृत्व को होना चाहिए था लेकिन हो रहा है ठीक इसके उलट यानी परेशान भाजपा हो रही है। दअसल, कुछ समय पहले तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनकी सरकार को लेकर कांग्रेस नेतृत्व और जनता में खासी नाराजगी थी, जिसके चलते भाजपा को 2018 के चुनाव अपनी वापसी की उम्मीद दिखने लगी थी, लेकिन कावेरी जल विवाद पर सिद्धारमैया अपने रवैये से कर्नाटक के 'मसीहा’ बन गए हैं। जनता में उनकी जय-जयकार हो रही है ऐसे में उनकी पार्टी उन्हें छेड़कर कोई जोखिम लेना नही चाहती, तो भाजपा यह सोच कर दुखी है कि उसकी अब तक की उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर गया।

फडनवीस की कुर्सी खतरे में!

महाराष्ट्र में जारी मराठा क्रांति मोर्चा का आंदोलन स्पष्ट तौर भाजपा की अंदरुनी कलह और सूबे में पार्टी पर शीर्ष नेतृत्व की पकड़ ढीली होने का संकेत है। मराठा क्रांति मोर्चा का दायरा जैसे जैसे फैल रहा है, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की कुर्सी पर खतरा भी बढ़ रहा है। शुरू में माना जा रहा था कि कांग्रेस और शरद पवार ने यह आंदोलन शुरू कराया है लेकिन अब साफ हो रहा है कि भाजपा के ही नेता इसे शह दे रहे हैं। मराठा क्रांति मोर्चा के जालना मे हुए बड़े प्रदर्शन में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और मराठा नेता राव साहेब दानवे भी शामिल हुए थे। मुख्यमंत्री के समर्थकों का कहना है कि नितिन गड़करी का भी मराठा आंदोलन को मौन समर्थन हासिल है। अपने विरोधियों को ठंडा करने के लिए ही फडनवीस ने भाजपा महासचिव और पूर्व प्रभारी ओम माथुर का स्वागत समारोह आयोजित कराया। इस समारोह में उन्होंने कहा कि वे नरेंद्र मोदी, अमित शाह और ओम माथुर के कारण मुख्यमंत्री बने हैं। माथुर ने भी उनके विरोधियो को संदेश देते हुए कहा कि फडनवीस मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी और शाह की पसंद है। लेकिन इस सबके बावजूद फडनवीस विरोधी मराठा नेता खामोश नहीं बैठ रहे हैं।

और अंत में

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान को अलग-थलग करने का दावा समझा जा सकता है लेकिन संयुक्त राष्ट्र की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने पर उसे भी यानी दुनिया के 198 देशों को अलग-थलग करने का दावा किया जा रहा है। है ना गजब की कूटनीतिक समझ!

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