चुनाव से पहले सर्वेक्षणों का घमासान

19  सितम्बर

@ अनिल जैन

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भाजपा और कांग्रेस के बीच औपचारिक चुनावी घमासान जब शुरू होगा तब होगा, फिलहाल तो इस या उस पार्टी के पक्ष में लोगों की धारणा बदलने या बनाने की गरज से कराए जा रहे चुनावी सर्वेक्षणों का घमासान मचा हुआ है। हालांकि इन सर्वेक्षणों के नतीजे अलग-अलग है इनके निष्कर्ष समान रूप से यह बता रहे हैं कि सूबे में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल रहा है। अलबत्ता हर सर्वे किसी न किसी खास पार्टी को नंबर एक पर दिखा रहा है। पिछले दिनों एक सर्वेक्षण में सपा और बसपा के बीच मुकाबला दिखाया गया था और उसमें सपा की बढ़त बताई गई थी। इसके बाद हुए सी वोटर के सर्वेक्षण में बताया गया कि लड़ाई भाजपा और सपा बीच है और भाजपा को मामूली बढ़त हासिल है। कुछ समय पहले एबीपी न्यूज ने भी एक सर्वेक्षण किया था जिसमें मुकाबला बसपा और भाजपा के बीच बताया गया था और बसपा की बढ़त दिखाते हुए समाजवादी पार्टी को तीसरे नंबर पर दिखाया गया था। सभी सर्वेक्षणों के निष्कर्ष में एक समानता यह भी है कि सभी में कांग्रेस को मुकाबले से बाहर दिखाते हुए चौथे नंबर की पार्टी बताया गया है। अभी चुनाव में लगभग चार महीने का समय बाकी है, लिहाजा अभी अन्य टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों के सर्वेक्षण भी सामने आना बाकी है।

प्रशांत किशोर की खाट रणनीति

उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की खाट सभाओं को लेकर खूब चर्चा हो रही है। चर्चा, अच्छी और बुरी दोनों तरह की है और यही प्रचार रणनीति की सफलता है। ब्रांडिग और मार्केटिंग के अहम सिद्धांतों में से एक यह भी है कि किसी तरह से चर्चा होनी चाहिए। इस लिहाज से कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की रणनीति कामयाब रही। उन्हें पता था कि खाट सभा के बाद लोग खाट लूट ले जाएंगे, इसके बावजूद उन्होंने इसका आयोजन कराया। उनकी टीम से जुड़े एक व्यक्ति का कहना है कि राहुल की सभा की खाटें देवरिया उत्तर प्रदेश के सैंकड़ों गांवों में पहुंच गई है। जहां कांग्रेस का कोई नामलेवा नहीं था वहां भी खाटों के बहाने कांग्रेस की चर्चा होगी। इसी तरह अगली खाट सभाओं मे अपने आप भारी भीड़ जुटेगी। बताया जा रहा है कि पांच हजार खाट बनवाने में करीब बीस लाख रुपए खर्च आएगा। अगर इतने खर्च से ही सभा में भीड़ जुटती है तो सौदा बहुत महंगा नहीं है।

शिवराज को नागपुर और दिल्ली का सहारा

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने इन दिनों अपने पुराने बॉस यानी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। हालांकि उन्होंने अभी सीधे शिवराज पर हमला नहीं बोला है लेकिन पार्टी में सब मान रहे हैं कि उन्होंने सूबे की नौकरशाही को अक्षम करार देकर एक तरह से शिवराज को ही अक्षम साबित करने की कोशिश की है। शिवराज भी उनकी इस निशानेबाजी को समझ रहे हैं लेकिन उन्होंने अपने स्वभाव के मुताबिक सीधे टकराने के बजाय विजयवर्गीय का इलाज करने के लिए दोतरफा रणनीति अपनाई है। एक ओर उन्होंने विजयवर्गीय के हमले का जवाब देने के लिए पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान को आगे किया है तो दूसरी ओर दिल्ली और नागपुर यानी पार्टी और संघ नेतृत्व से अपने रिश्तों को बेहतर बनाने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक लड़ाई में तेजी सूबे की खाली हुई राज्यसभा की एक सीट पर चुनाव की घोषणा के बाद आएगी। विजयवर्गीय यह सीट अपने लिए चाहते हैं, जबकि शिवराज की कोशिश है कि सीट किसी को भी मिल जाए पर विजयवर्गीय को कतई नहीं।

आशुतोष भी देखेंगे दरवाजा!

दिल्ली से राज्यसभा की तीन सीटें हैं जिनके लिए 2018 में नए चुनाव होंगे। विधानसभा में संख्या बल के लिहाज से तीनों सीटें आम आदमी पार्टी को मिलना तय है। लेकिन यही तीनों सीटें लंबे अरसे से पार्टी में अंदरुनी कलह की वजह बनी हुई है। दो साल पहले योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और अजित झा पार्टी से बाहर किए जाने की एक वजह यह कलह भी थी और इसी कलह के चलते अब पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष को भी जल्दी ही दरवाजा दिखाया जा सकता है। पार्टी में संजय सिंह, कुमार विश्वास और आशीष खेतान के साथ ही आशुतोष भी राज्यसभा के लिए दावेदार बताए जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों से अरविंद केजरीवाल से आशुतोष की दूरी बढ़ी है और इसी वजह से पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में उन्हें कोई भूमिका नहीं सौंपी गई है। आशुतोष ने अपनी अहमियत जताने के लिए गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को आम आदमी पार्टी के साथ लाने का प्रयास किया लेकिन नाकाम रहे। इसके बाद केजरीवाल को खुश करने के लिए उन्होंने सेक्स स्कैंडल में फंसे संदीप कुमार का न सिर्फ बचाव किया बल्कि महात्मा गांधी, नेहरू और लोहिया तक के नाम विवाद में घसीट लाए। केजरीवाल इससे भी नाराज हुए और उन्होंने मनीष सिसोदिया के जरिए आशुतोष के बयान का खंडन कराया। केजरीवाल के इसी रुख से बौखलाकर आशुतोष ने दिल्ली में संसदीय सचिवों की नियुक्ति को हाईकोर्ट द्वारा खारिज करने पर टिप्पणी करने से यह कहते हुए किनारा कर लिया कि इस पर दिल्ली सरकार से पूछिए।

रामनरेश यादव का क्या होगा?

मध्य प्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव रिटायर हो गए है। बताया जा रहा है कि व्यापमं मामले में अब उन पर मुकदमा दर्ज हो सकता है। मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाले में राज्यपाल रहते रामनेश यादव का और उनके साथ उनके बैटे शैलेश यादव का भी नाम आया था। बाद में उनके बेटे की संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी। राज्यपाल को मिलने वाले विशेषाधिकार की वजह से रामनेश यादव पर तो मुकदमा नही हो पाया था, लेकिन उनके बेटे पर मुकदमा दर्ज हुआ था। अब कहा जा रहा है कि पूर्व राज्यपाल पर भी मुकदमा दर्ज हो सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि अगर उन पर मुकदमा हुआ तो यह भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है। बुजुर्ग नेता रामनेश यादव पर मुकदमे से यादव मतदाता नाराज हो सकते हैं। वैसे पार्टी के कुछ नेता यह भी कह रहे है कि यादव वोट पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ है इसलिए भाजपा को इस बारे मे चिता नही करनी चाहिए।

और अंत में

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने हिंदी दिवस के अवसर पर शुध्द हिंदी में ही कहा कि अच्छे दिन का वादा हमारे गले की हड्डी बन गया है। पर टीवी के किसी भी खबरिया चैनल को शायद उनकी बात पल्ले नहीं पडी और इसीलिए वे पूरे समय उत्तर प्रदेश के चाचा-भतीजे के दंगल का एंगल ही समझाने में लगे रहे।

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