इस हेड आॅन डिप्लामैसी में रिस्क फैक्टर ज्यादा है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का काबुल से लाहौर जाने का आकस्मिक निर्णय न केवल भारत के लोगों को चैंकाने वाला लगा, बल्कि पाकिस्तान के लोग भी इससे चैंके। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अकस्मात लाहौर पहुंचना और फिर लाहौर एयरपोर्ट से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ हेलीकाॅप्टर में बैठकर उनके घर जट्टी उमरा में रायविंड पैलेस पहुंचने को भ्रमात्मक नजरिए से देखा या फिर गूढ़ और अन्वेषी कदम के नजरिए से, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। यद्यपि मोदी के इस कदम को कुछ विशेषज्ञ मास्टर स्ट्रोक के रूप में देखते हैं और कुछ ‘हेड आॅन डिप्लोमैसी, के रूप में, लेकिन पाकिस्तान का जो चरित्र रहा है और सेना की तरफ से जिस तरह से शांति दिखायी जा रही है और राहिल शरीफ का अगवानी में शामिल न होना देखा जा रहा है, वह रिस्क एलीमेंट की ओर भी इशारा करता है।

किसी भारतीय प्रधानमंत्री की करीब 12 साल बाद यह पहली पाकिस्तान यात्रा है, इस लिहाज से इसकी सराहना करना अतार्किक नहीं है। यदि इससे दोनों के बीच रिश्ते आगे बढ़ते हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन बिना तैयारी के लाहौर पहुंचना, उनके घर जाकर केक खाना या नवाज शरीफ की नातिन की मेंहदी की रस्म में शामिल होना, क्या यह सहज कूटनीतिक परिवर्तन है। जैसा कि सरकारी लाइन प्रवक्ताओं का मानना है कि प्रधानमंत्री ने नवाज शरीफ के व्यक्तिगत आमंत्रण पर लाहौर जाने का निर्णय लिया है, यानि यह उनकी निजी यात्रा है, तो फिर इससे कूटनीतिक नतीजों पर बहस क्यों, और प्रधानमंत्री की चातुर्यपूर्ण नीति से कनेक्शन क्यों? गौर से देखें तो यह परिवर्तन पेरिस हमलों के बाद शुरू हुआ। दरअसल इस परिवर्तन की नवाज शरीफ को जरूरत थी, क्योंकि पेरिस के बाद पुनः एक ‘वार इनड्यूरिंग फ्रीडम’ जैसी शुरूआत की संभावना बनने लगी थी। स्वाभाविक है कि ऐसी किसी भी मुहिम की राह पाकिस्तान तक अवश्य जाती है। चूंकि भारत पाकिस्तानी आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित रहा है और वैश्विक मंचों पर इसके खिलाफ आवाज उठाता रहा है, इसलिए यह बात अहम थी कि यदि भारत का रुख इस मामले में नरम पड़ता है तो पाकिस्तान आतंकवाद पर हो रहे हमलों से सीधा बच जाएगा। इसके बाद ऐसे परिवर्तनों का प्रधानमंत्री में दिखना, इस बात का संकेत है कि परिवर्तन की बुनियाद भारत से बाहर रखी गयी और भारत पर इसके लिए दबाव बने। अन्यथा भारत को उफा में हुयी बातचीत पर अपनी समीक्षा करनी चाहिए थी। बैंकाक में एनएसए मीटिंग के बाद जो प्रगति होनी है उसके परिणामों में समीक्षा होनी चाहिए थी, तत्पश्चात प्रधानमंत्री को इस तरह के कदम उठाने की जरूरत थी। फिलहाल पाकिस्तानी मीडिया में इन शब्दों का उछलना कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ उनके विमान में गप्पे हांकते हुए उनके घर तक जाना, इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती थी। वैसे नरेन्द्र मोदी ने ऐसा निर्णय पहली बार नहीं लिया है, बल्कि ओथ डिप्लोमैसी के बाद बढ़ती दूरियों और एनएसए वार्ता को तोड़ने के बाद क्रिकेट वल्र्ड कप की शुरूआत पर नवाज को फोन पर बधाई देना, फिर उफा में शुरूआत और परिणाम परम्परागत....अब पेरिस से एक नयी शुरूआत ....लेकिन बिना किसी तैयारी के जो कदम उठाए जा रहे हैं, उनके परिणाम असंदिग्ध हैं।

फिलहाल तो यह शर्म-अल-शेख से भी एक आगे वाला कदम लगता है।

डाॅ. रहीस सिंह

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