भारत-चीन: यथार्थ की भूमि पर

06  सितम्बर

 
@ डॉ. वेदप्रताप वैदिक 
 
चीन में चल रहे जी-20 सम्मेलन का फायदा नरेंद्र मोदी ने काफी अच्छा उठाया। चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग से मोदी ने काफी खरी-खरी बातें कही। हमारे प्रवक्ता ने वहां पत्रकारों को जो बताया, अगर वह सही है तो मानना पड़ेगा कि हमारी सरकार विदेश नीति के मामले में यथार्थवादी होती जा रही है। मोदी ने शी से दो बातें साफ-साफ कहीं। एक तो आतंकवाद की और दूसरी पाक-चीन आर्थिक बरामदे की। मोदी ने किसी भी देश का नाम लिये बिना शी से कहा कि आतंकवाद पर हमारे सभी राष्ट्रों का रवैया एक-जैसा होना चाहिए। आतंक कहीं से भी आए, उसका डटकर विरोध होना चाहिए। इस मामले में राजनीतिक लिहाजदारी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। मोदी ने शी से हाल ही में किरगिजिस्तान में चीनी दूतावास पर हुए आतंकी हमले का जिक्र किया। मोदी को अगर पता होता तो वे शी को यह भी बताते की चीन के सिक्यांग प्रांत के मुसलमानों में आतंकवाद फैल रहा है। उन्हें पाक-अधिकृत कश्मीर से हथियार, प्रशिक्षण और पैसा भी मिलता है। वे अब चीन के बड़े-बड़े शहरों में आतंकी वारदात करते रहते हैं। मोदी ने शी से उस बरामदे के बारे में भी बात की, जो चीन 46 अरब डाॅलर लगाकर बना रहा है। यह बरामदा कश्मीर में से होकर गुजरेगा, जो कि कानून तौर पर भारत का है, लेकिन जिसे पाकिस्तान ने 1963 में एक समझौते की तहत चीन को दे दिया था। 
 
मोदी ने तो अपनी बात कह दी लेकिन उसका असर क्या हुआ? क्या शी ने कोई आश्वासन दिया? क्या वर्तमान स्थिति में कोई फर्क पड़ा? चीन अपनी जगह डटा हुआ है। उसने पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित नहीं होने दिया। संयुक्तराष्ट्र संघ के प्रस्ताव में रोड़ा लगा दिया। इसी तरह चीन ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश पर अडंगा लगा दिया। कुल मिलाकर नतीजा यह है कि ढाई साल पहले चीन को लेकर हम जो झूला झूल रहे थे, वह रुक गया है और अब हमें यथार्थ की जमीन पर आना पड़ गया है। पाकिस्तान को चीन आर्थिक् मदद करे, इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन उसे वह भारत के विरुद्ध मोहरे की तरह इस्तेमाल करे, यह ठीक नहीं है। 

 

अन्य विचार पढ़ें

Total votes: 209